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जरूरी कामों को बार-बार टालना कई लोगों की आम समस्या बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह हमेशा आलस का संकेत नहीं होता, बल्कि इसके पीछे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कारण भी हो सकते हैं। मनोविज्ञान में इस आदत को ‘प्रोक्रैस्टिनेशन’ कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति किसी जरूरी काम को जानते-बूझते टालता रहता है, भले ही उसे पता हो कि इससे बाद में परेशानी होगी।
मनोचिकित्सक डॉ. द्रोण शर्मा के अनुसार, प्रोक्रैस्टिनेशन अक्सर चिंता, असफलता के डर, परफेक्शनिज्म, आत्मविश्वास की कमी या काम से जुड़ी भावनात्मक असहजता से जुड़ा होता है। ऐसे में व्यक्ति काम शुरू करने के बजाय सोशल मीडिया, मोबाइल या अन्य गैर-जरूरी गतिविधियों में समय बिताने लगता है, क्योंकि इससे उसे तुरंत मानसिक राहत मिलती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि दिमाग कठिन, उबाऊ या तनावपूर्ण लगने वाले कामों से बचने की कोशिश करता है। वहीं मोबाइल और सोशल मीडिया जैसी चीजें तुरंत आनंद और संतुष्टि देती हैं, जिससे काम टालने की आदत और मजबूत हो जाती है। खासकर घर से काम करने वाले लोगों में यह समस्या अधिक देखी जाती है।
डॉ. शर्मा के मुताबिक, प्रोक्रैस्टिनेशन के पीछे छिपे असली कारणों को पहचानना जरूरी है। कई बार व्यक्ति काम शुरू नहीं कर पाता क्योंकि उसे असफलता, आलोचना या अपेक्षाओं पर खरा न उतरने का डर होता है। कुछ लोग यह सोचकर भी काम टालते हैं कि जब तक काम पूरी तरह सही न हो, तब तक शुरुआत ही न की जाए।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि बड़े कामों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर शुरू किया जाए। काम शुरू करने के लिए केवल 10 से 15 मिनट का लक्ष्य तय करना, मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाना तथा रोज सिर्फ तीन सबसे जरूरी कामों पर ध्यान देना इस आदत को कम करने में मदद कर सकता है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अगर काम टालने की आदत के साथ लगातार उदासी, अत्यधिक चिंता, नींद की समस्या, नशे की लत या कामकाज पर गंभीर असर दिखाई दे रहा हो, तो पेशेवर मदद लेना जरूरी हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोक्रैस्टिनेशन कोई चरित्र दोष नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक पैटर्न है, जिसे सही समझ, छोटे कदमों और नियमित अभ्यास से बदला जा सकता है।





