संयुक्त सत्र से पहले राजनीतिक हलचल तेज, सरकार विपक्ष की नजरें राज्यपाल पर

कर्नाटक में राजनीतिक संशय की स्थिति समाप्त हो गई है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत गुरुवार को विधान सौधा पहुंच गए, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वे विधानसभा के संयुक्त सत्र को संबोधित करेंगे। इससे पहले बुधवार को राज्यपाल द्वारा संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इनकार करने के बाद राज्य सरकार और राजभवन के बीच तनातनी की स्थिति बन गई थी।

विधान सौधा पहुंचने पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, विधानसभा अध्यक्ष यूटी खादेर, विधान परिषद के सभापति बासवराज होरट्टी और कानून मंत्री एचके पाटिल ने राज्यपाल का स्वागत किया।

दरअसल, राज्यपाल ने सरकार द्वारा तैयार भाषण में केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना और मनरेगा को लेकर की गई टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए संयुक्त सत्र को संबोधित करने से इनकार कर दिया था। इसी को लेकर विवाद खड़ा हो गया।

बुधवार शाम कानून मंत्री एचके पाटिल के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल से मुलाकात की। इस दौरान एडवोकेट जनरल शशि किरन शेट्टी और मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार एएस पोन्ना भी मौजूद रहे। गुरुवार को पाटिल ने मीडिया से कहा कि संविधान के अनुच्छेद 176(1) के तहत राज्यपाल को कैबिनेट द्वारा तैयार भाषण पढ़ना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का भाषण सरकार की नीतियों की आधिकारिक घोषणा होता है और इसमें चयन का अधिकार नहीं है।

पाटिल ने चेतावनी दी कि यदि राज्यपाल भाषण के किसी हिस्से को पढ़ने से इनकार करते हैं तो यह संविधान का उल्लंघन होगा और सरकार आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य सरकार विवाद को सुलझाने के लिए भाषण के कुछ अंश हटाने को तैयार हो गई है। वहीं, एडवोकेट जनरल के दिल्ली में होने के कारण यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि आवश्यकता पड़ने पर मामला कानूनी लड़ाई तक जा सकता है। बीते दो दिनों में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच यह तीसरा विवाद है। इससे पहले तमिलनाडु और केरल में भी राज्यपाल और सरकारों के बीच संयुक्त सत्र के भाषण को लेकर टकराव सामने आ चुका है।

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