प्राइवेट प्रैक्टिस की रोक पर भड़के डॉक्टर्स, सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी मंत्री ने दी प्रतिक्रिया

चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने कहा कि उन्हें अब तक किसी अधीक्षक का इस्तीफा प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि चिकित्सकों ने कुछ मांगें रखी थीं, जिन पर सरकार विचार कर रही है।
मंत्री ने कहा कि प्राचार्य और अधीक्षक पूर्णकालिक प्रशासनिक पद हैं और यदि वे OPD और निजी प्रैक्टिस में व्यस्त रहेंगे तो अस्पतालों के प्रशासनिक कामकाज पर असर पड़ेगा। इसी को आधार बनाकर यह आदेश जारी किया गया है।
अलग से प्रशासक नियुक्त करने के संकेत
मंत्री खींवसर ने यह भी संकेत दिया कि यदि प्राचार्य और अधीक्षक केवल क्लीनिकल कार्य करना चाहते हैं और प्रशासनिक जिम्मेदारियां नहीं लेना चाहते, तो सरकार मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में अलग से एडमिनिस्ट्रेटिव अधिकारी नियुक्त करने पर विचार कर सकती है।
क्या है विवादित आदेश?
- 11 नवंबर को जारी इस आदेश में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं—
- मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल और अधीक्षक निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे।
- किसी डॉक्टर को सीधे प्रिंसिपल नहीं बनाया जाएगा।
- प्रिंसिपल पद के लिए 3 वर्ष अधीक्षक/अतिरिक्त प्रिंसिपल और 2 वर्ष HOD का अनुभव अनिवार्य।
- प्रिंसिपल चयन के लिए 4 सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी बनाई गई।
- प्रिंसिपल और अधीक्षक केवल 25% तक ही क्लीनिकल कार्य कर सकेंगे।
- दोनों पदाधिकारियों को यूनिट हेड या HOD नहीं बनाया जाएगा।
स्वास्थ्य विभाग के इस निर्णय के बाद पूरे राज्य में चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। चिकित्सक इसे अधिकारों में हस्तक्षेप मान रहे हैं, जबकि सरकार प्रशासनिक कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए इसे आवश्यक बता रही है।





