17 साल बाद बड़ा बदलाव: जल और वायु प्रदूषण शुल्क में सरकार ने की वृद्धि

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) की एनओसी (No Objection Certificate) के लिए लिए जाने वाले जल और वायु शुल्क में 17 वर्ष बाद बढ़ोतरी कर दी है। इससे अब राज्य में उद्योगों, नगर निकायों और आवासीय–वाणिज्यिक परियोजनाओं को पहले के मुकाबले 2 से 2.6 गुना तक अधिक शुल्क देना होगा।

कैबिनेट ने उप्र जल (मल एवं व्यावसायिक बहिस्राव निस्तारण सहमति) नियमावली–2025 और उप्र वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) नियमावली–2025 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। नए प्रावधानों के अनुसार शुल्क में हर दो वर्ष में 10% तक वृद्धि की जा सकेगी।

राजस्व बढ़ाने और बढ़ते कामकाज का तर्क

सरकारी प्रवक्ता के अनुसार, यह बदलाव इसलिए आवश्यक था क्योंकि UPPCB का मुख्य राजस्व स्रोत उद्योगों से मिलने वाला सहमति जल एवं वायु शुल्क ही है, जिसमें 2008 के बाद कोई वृद्धि नहीं हुई थी।
इस दौरान मूल्य सूचकांक 2.65 गुना बढ़ चुका है और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कार्य, न्यायालयों के आदेश संचालन और इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ने के कारण बोर्ड की आय बढ़ाना जरूरी हो गया था।

शुल्क निर्धारण के लिए 7 नई श्रेणियां

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों के तहत शुल्क निर्धारण के लिए 7 श्रेणियां तय की गई हैं।
प्रदूषण स्तर के आधार पर उद्योगों को

हरी,

नारंगी,

लाल
श्रेणी में रखा जाएगा और उसी के अनुसार शुल्क लगेगा।

जल एवं वायु अधिनियम के तहत दोनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग फीस संरचना लागू की गई है।

डीजल जेनरेटर सेट पर नई दरें

जिन औद्योगिक इकाइयों में वायु प्रदूषण का एकमात्र स्रोत डीजल जनरेटर है, उन्हें उसकी क्षमता के आधार पर ₹1,000 से ₹5,000 तक वार्षिक शुल्क देना होगा।
हालांकि, 250 KVA या इससे कम क्षमता वाले जेनरेटर पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।

आवासीय–वाणिज्यिक कॉम्प्लेक्स के लिए भी नए शुल्क

स्थानीय निकायों, टाउनशिप, अपार्टमेंट, वाणिज्यिक कॉम्प्लेक्स, शैक्षणिक संस्थान और कार्यालय परिसरों के लिए वार्षिक शुल्क ₹5,000 से ₹6 लाख तक तय किया गया है।
इनके लिए संचालन शुल्क मानक शुल्क का डेढ़ गुना होगा।

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