चीन का साथ भी नहीं आया काम: ब्रिक्स में पाकिस्तान की राह क्यों मुश्किल, सदस्यता के फैसले में भारत कितना ताकतवर?

भारत की मेजबानी में 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दिल्ली में चल रहा है। समूह के विस्तार को लेकर भी लगातार चर्चा है। पाकिस्तान ने वर्ष 2023 में ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था, लेकिन अब तक उसे संगठन में जगह नहीं मिल सकी है। खास बात यह है कि पाकिस्तान को चीन का समर्थन हासिल है। इसके बावजूद उसकी सदस्यता आगे नहीं बढ़ पाई।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ब्रिक्स में किसी नए देश को शामिल करने का नियम क्या है? पाकिस्तान की राह में कौन सी अड़चनें हैं और भारत की इसमें क्या भूमिका है? आइए समझते हैं।

पहले जानें- ब्रिक्स में कैसे मिलती है सदस्यता?

ब्रिक्स में नए देशों को शामिल करने की प्रक्रिया सर्वसम्मति और तय किए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों पर आधारित है। किसी आवेदन को केवल बहुमत के आधार पर मंजूरी नहीं दी जाती।

1. सभी सदस्यों की सहमति जरूरी

ब्रिक्स का कोई भी फैसला सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति से लिया जाता है। यानी अगर किसी एक मौजूदा सदस्य को किसी देश की सदस्यता पर आपत्ति है, तो उसके आवेदन को आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाता है।

2. औपचारिक आवेदन और चर्चा

सदस्यता चाहने वाले देश को ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहे देश और संगठन के सामने औपचारिक आवेदन देना होता है। इसके बाद आवेदन पर विदेश मंत्रियों और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चर्चा होती है।

3. कुछ मानदंड भी पूरे करने होते हैं

2023 के जोहानेसबर्ग शिखर सम्मेलन में सदस्यता विस्तार के लिए औपचारिक मानदंड तय किए गए थे। इनमें आवेदक देश के सभी मौजूदा ब्रिक्स सदस्यों के साथ सकारात्मक कूटनीतिक संबंध, बहुपक्षवाद और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के प्रति प्रतिबद्धता तथा ग्लोबल साउथ और बहुध्रुवीय व्यवस्था के समर्थन जैसे पहलू शामिल हैं।

4. अंतिम फैसला और आधिकारिक आमंत्रण

जब सभी मौजूदा सदस्य किसी देश के आवेदन पर सहमत हो जाते हैं, तभी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उस देश को पूर्ण सदस्य बनने का आधिकारिक आमंत्रण दिया जाता है।

फिर पाकिस्तान की एंट्री क्यों नहीं हो पाई?

पाकिस्तान ने 2023 में ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता के लिए आवेदन किया था। हालांकि, समूह में नए सदस्य को शामिल करने के लिए संस्थापक और स्थायी सदस्यों की सहमति महत्वपूर्ण है। भारत ब्रिक्स के संस्थापक देशों में शामिल है।

पाकिस्तान की मुश्किल सिर्फ भारत के साथ उसके रिश्तों तक सीमित नहीं है। ब्रिक्स के सदस्यता मानदंड में सभी मौजूदा सदस्यों के साथ सकारात्मक कूटनीतिक संबंधों पर भी जोर दिया गया है। आतंकवाद से जुड़े मुद्दों के कारण पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि और कई देशों के साथ उसके संबंध भी उसकी राह में चुनौती माने जाते हैं।

चीन के समर्थन के बावजूद क्यों नहीं बनी बात?

पाकिस्तान को चीन का सार्वजनिक समर्थन हासिल है। उसने रूस के साथ भी पिछले वर्षों में अपने संबंध मजबूत करने की कोशिश की है। लेकिन ब्रिक्स में सिर्फ किसी एक बड़े देश का समर्थन पर्याप्त नहीं है। सदस्यता के लिए व्यापक सहमति जरूरी होती है। यही वजह है कि चीन का समर्थन होने के बावजूद पाकिस्तान को पूर्ण सदस्यता नहीं मिल सकी।

भारत की ताकत क्या है?

ब्रिक्स में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका संस्थापक सदस्य होना और सभी मौजूदा सदस्यों के साथ व्यापक कूटनीतिक संबंध होना है। समूह के विस्तार में सर्वसम्मति के नियम के कारण किसी नए सदस्य को शामिल करने के फैसले में भारत की सहमति महत्वपूर्ण हो जाती है।

स्रोत के अनुसार, भारत के ब्रिक्स के सभी देशों के साथ गहरे संबंध हैं, जबकि पाकिस्तान के लिए सभी सदस्यों के साथ सकारात्मक कूटनीतिक संबंधों की शर्त चुनौतीपूर्ण है।

पूर्ण सदस्यता नहीं तो पार्टनर कंट्री का विकल्प

ब्रिक्स ने 2024 के कजान शिखर सम्मेलन में ‘पार्टनर कंट्री’ की नई श्रेणी शुरू की। इसका मकसद ऐसे देशों को ब्रिक्स की पहलों, बैठकों और व्यापारिक व्यवस्थाओं से जोड़ना है, जिन्हें पूर्ण सदस्यता नहीं मिल पाती।

पाकिस्तान और तुर्किये को इसी व्यवस्था के तहत ब्रिक्स साझेदार देश बनने का प्रस्ताव दिया गया था। हालांकि, दोनों देशों की ओर से इस पर अब तक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

पाकिस्तान ब्रिक्स में क्यों आना चाहता है?

पाकिस्तान के लिए ब्रिक्स की सदस्यता आर्थिक और कूटनीतिक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। देश लंबे समय से आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है और ब्रिक्स के जरिए अपने आर्थिक एवं वित्तीय विकल्पों को बढ़ाना चाहता है।

वह आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी पश्चिमी देशों के प्रभाव वाली संस्थाओं पर निर्भरता कम करने तथा ब्रिक्स से जुड़ी वित्तीय व्यवस्थाओं तक पहुंच बनाने की उम्मीद भी रखता है।

इसके अलावा, ब्रिक्स के सदस्य देश वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, खाद्य उत्पादन और व्यापार में बड़ी भूमिका रखते हैं। पाकिस्तान को उम्मीद है कि समूह में शामिल होने से उसे व्यापार, निवेश और नए भुगतान तंत्रों के अवसर मिल सकते हैं।

निष्कर्ष: चीन का समर्थन काफी नहीं

पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता का मामला यह दिखाता है कि किसी एक शक्तिशाली देश का समर्थन संगठन में प्रवेश की गारंटी नहीं है। ब्रिक्स में सर्वसम्मति का नियम सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ सदस्यता के लिए तय कूटनीतिक और राजनीतिक मानदंडों को पूरा करना भी जरूरी है।

फिलहाल पाकिस्तान के लिए पूर्ण सदस्यता की राह मुश्किल बनी हुई है, जबकि पार्टनर कंट्री के रूप में जुड़ने का विकल्प उसके सामने मौजूद है। वहीं भारत की संस्थापक सदस्य के रूप में स्थिति और व्यापक कूटनीतिक रिश्ते उसे ब्रिक्स के विस्तार से जुड़े फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका देते हैं।

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