Last Man in Tower Review: भावनाओं और उसूलों की ऐसी लड़ाई, मनोज बाजपेयी की फिल्म कर देगी बेचैन

मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता और बोमन ईरानी की फिल्म ‘लास्ट मैन इन टावर’ 11 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। बेन रेखी के निर्देशन में बनी यह फिल्म अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। फिल्म को समीक्षा में 3.5/5 की रेटिंग दी गई है।
क्या है कहानी?
फिल्म की कहानी मुंबई की पुरानी विश्राम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी में रहने वाले रिटायर्ड शिक्षक योगेश मिश्रा उर्फ मास्टरजी की है, जिसका किरदार मनोज बाजपेयी ने निभाया है। बिल्डर धर्मेन शाह सोसायटी को गिराकर वहां आलीशान टावर ‘द शंघाई’ बनाने का प्रस्ताव रखता है। इसके बदले वह सोसायटी के लोगों को मोटी रकम और बेहतर जीवनशैली देने का वादा करता है।
शुरुआत में कई लोग इस प्रस्ताव के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, लेकिन कुछ लोग अपने घर, यादों और भावनाओं के कारण इसका विरोध करते हैं। आखिर में मास्टरजी इस विरोध में अकेले रह जाते हैं। इसके बाद कहानी उनके सिद्धांतों और यादों को बचाने की लड़ाई पर केंद्रित हो जाती है।
मनोज बाजपेयी ने संभाली पूरी फिल्म
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मनोज बाजपेयी की अदाकारी है। मायूस पिता और मिडिल क्लास व्यक्ति के किरदार में उन्होंने भावनाओं को बेहद प्रभावी ढंग से पेश किया है। फिल्म की पूरी कहानी काफी हद तक उनके किरदार के कंधों पर टिकी हुई है और वह दर्शकों को निराश नहीं करते।
दिव्या दत्ता ने मास्टरजी की पड़ोसी का किरदार निभाया है। बेहतर भविष्य की तलाश में उनके किरदार के बदलते रंग दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं। बोमन ईरानी बिल्डर की भूमिका में हैं, जबकि सुकांत गोयल मास्टरजी के बेटे के किरदार में नजर आते हैं।
सादगी ही फिल्म की ताकत
निर्देशक बेन रेखी ने फिल्म को बिना किसी अतिरिक्त चमक-दमक के सादगी और भावनाओं के साथ पेश किया है। इसमें न कोई जबरदस्त एक्शन है और न ही किसी हीरो की चमत्कारिक एंट्री। कहानी एक आम मिडिल क्लास व्यक्ति की परिस्थितियों और संघर्ष को उसी सहजता से दिखाती है, जिससे दर्शक उससे जुड़ पाते हैं।
फिल्म परिवार, समाज, नैतिकता और मूल्यों को लेकर कई सवाल खड़े करती है। इसकी कहानी अंत तक पहुंचते-पहुंचते दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।
धीमी रफ्तार कर सकती है परेशान
फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी धीमी रफ्तार है। चूंकि यह ड्रामा आधारित कहानी है और इसमें ज्यादा सजावट या रोमांचक तत्व नहीं हैं, इसलिए कुछ हिस्से दर्शकों को लंबे और बोरिंग लग सकते हैं।
देखें या नहीं?
अगर आप एक्शन और तेज रफ्तार फिल्मों के शौकीन हैं तो यह फिल्म शायद आपको उतनी पसंद न आए। लेकिन मनोज बाजपेयी की अदाकारी के प्रशंसकों के लिए यह फिल्म देखने लायक है। समाज से जुड़े मुद्दे और संदेश वाली गंभीर कहानी पसंद करने वाले दर्शक भी इसे पसंद कर सकते हैं, बस इसके लिए थोड़ा धैर्य रखना होगा।





