रतन टाटा के दौर में बदली थी किस्मत, अब फिर संकट में जगुआर-लैंड रोवर; चीन से टैरिफ तक बनी चुनौती

दुनिया की लग्जरी कारों के लिए मशहूर जगुआर-लैंड रोवर (JLR) एक बार फिर बड़े आर्थिक संकट से गुजर रही है। कंपनी ने अगले दो वर्षों में दुनियाभर में करीब 4,000 नौकरियों में कटौती करने की घोषणा की है। लागत घटाने की इस योजना के बीच कंपनी को साइबर हमले, अमेरिकी टैरिफ, चीन में बिक्री की गिरावट और इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने की भारी लागत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि यही कंपनी करीब 18 साल पहले भी मुश्किल दौर में थी। वर्ष 2008 में टाटा मोटर्स ने फोर्ड से जगुआर-लैंड रोवर को खरीद लिया था। इसके बाद रतन टाटा के नेतृत्व में कंपनी ने कई साल तक शानदार वापसी की।

अब रतन टाटा के निधन के करीब दो साल बाद जेएलआर फिर गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है।

कभी मोटरसाइकिल की साइडकार बनाती थी कंपनी

आज जगुआर अपनी लग्जरी और स्पोर्ट्स कारों के लिए जानी जाती है, लेकिन इसकी कहानी काफी अलग रही है। जगुआर और लैंड रोवर मूल रूप से दो अलग-अलग कंपनियां थीं, जिनका इतिहास बाद में एक-दूसरे से जुड़ा और अंततः दोनों जेएलआर का हिस्सा बनीं।

जगुआर ने धीरे-धीरे अपनी पहचान लग्जरी और स्पोर्ट्स कार निर्माता के तौर पर बनाई। वहीं लैंड रोवर ने मजबूत ऑफ-रोड और लग्जरी एसयूवी के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान कायम की।

रतन टाटा और फोर्ड की कहानी

जगुआर-लैंड रोवर को टाटा मोटर्स द्वारा खरीदे जाने की कहानी को अक्सर रतन टाटा और फोर्ड के बीच पुराने घटनाक्रम से जोड़कर देखा जाता है।

1998 में टाटा मोटर्स ने अपनी स्वदेशी कार टाटा इंडिका लॉन्च की थी। शुरुआती दौर में इसकी बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं रही और पैसेंजर कार कारोबार को लेकर टाटा मोटर्स को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा।

इसके बाद रतन टाटा अपनी पैसेंजर कार इकाई बेचने के विकल्प पर विचार करने लगे। इसी सिलसिले में उनकी अमेरिका के डेट्रॉयट में फोर्ड के अधिकारियों से मुलाकात हुई।

बताया जाता है कि बैठक में फोर्ड के अधिकारियों ने टाटा के पैसेंजर कार कारोबार पर सवाल उठाए और उन्हें यह तक कहा कि उन्हें इस कारोबार में उतरना ही नहीं चाहिए था। इस मुलाकात से रतन टाटा आहत हुए और वह सौदा किए बिना भारत लौट आए।

इंडिका की सफलता ने बदली तस्वीर

भारत लौटने के बाद रतन टाटा ने पीछे हटने के बजाय इंडिका को सफल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया। कंपनी ने अपनी रणनीति पर काम जारी रखा और धीरे-धीरे इंडिका की बिक्री में सुधार आया।

वर्ष 2004 तक इंडिका का निर्यात यूरोप और अफ्रीका तक होने लगा। वर्ष 2007 में इसकी घरेलू बिक्री करीब 1.42 लाख यूनिट तक पहुंच गई।

यानी जिस पैसेंजर कार कारोबार को कभी बेचने की नौबत आई थी, वही आगे चलकर टाटा मोटर्स के लिए महत्वपूर्ण कारोबार बन गया।

2008 में फोर्ड खुद संकट में फंसी

इसके करीब नौ साल बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं।

वर्ष 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान फोर्ड मोटर्स पर भारी वित्तीय दबाव आया। कंपनी को अपने कारोबार को पुनर्गठित करने और गैर-जरूरी संपत्तियों को बेचने की जरूरत महसूस हुई।

इसी दौरान जगुआर और लैंड रोवर को बेचने की प्रक्रिया शुरू हुई। टाटा मोटर्स ने दोनों ब्रांड्स को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई।

जून 2008 में टाटा मोटर्स ने करीब 2.3 अरब डॉलर की ऑल-कैश डील के जरिए जगुआर-लैंड रोवर का अधिग्रहण कर लिया।

इस सौदे को कारोबारी दुनिया में रतन टाटा की बड़ी उपलब्धियों में गिना गया। इसे अक्सर उस पुराने फोर्ड प्रकरण के संदर्भ में भी देखा गया, हालांकि ‘बदले’ वाली कहानी का आधिकारिक तौर पर कोई पुष्ट बयान सामने नहीं आया।

टाटा के नेतृत्व में जेएलआर ने की शानदार वापसी

जगुआर-लैंड रोवर के अधिग्रहण के बाद टाटा मोटर्स ने कंपनी के ब्रिटिश नेतृत्व और इंजीनियरिंग टीम को काफी हद तक स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति दी। साथ ही उसे वित्तीय और रणनीतिक सहयोग दिया गया।

2010 से 2020 तक जेएलआर के सीईओ रहे डॉ. राल्फ स्पेथ के नेतृत्व में कंपनी ने नए मॉडल और डिजाइन रणनीति पर जोर दिया।

कंपनी ने रेंज रोवर इवोक, रेंज रोवर और रेंज रोवर स्पोर्ट जैसे मॉडल पेश किए। इन मॉडलों को वैश्विक बाजार में अच्छी प्रतिक्रिया मिली।

इसके परिणामस्वरूप जेएलआर की बिक्री और कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। भारत में भी कंपनी ने उत्पादन शुरू किया और पुणे प्लांट में रेंज रोवर तथा रेंज रोवर स्पोर्ट के निर्माण से भारतीय बाजार में इसकी मौजूदगी मजबूत हुई।

अब फिर क्यों मुश्किल में है जगुआर-लैंड रोवर?

जेएलआर के मौजूदा संकट के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं।

1. साइबर हमले ने रोका उत्पादन

सितंबर 2025 में कंपनी के आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े साइबर हमले का असर पड़ा। इसके बाद कंपनी को अपने आईटी सिस्टम को ऑफलाइन करना पड़ा।

इसका प्रभाव ब्रिटेन के हैलेवुड, सोलीहुल और वोल्वरहैम्प्टन स्थित कारखानों पर पड़ा और करीब पांच सप्ताह तक उत्पादन बुरी तरह प्रभावित रहा।

इस व्यवधान के चलते कंपनी के कुल उत्पादन में करीब 27 फीसदी की गिरावट आई और उसे लगभग 20 करोड़ पाउंड का सीधा नुकसान हुआ।

2. मुनाफे में करीब 99 फीसदी की गिरावट

साइबर हमले और दूसरी वैश्विक चुनौतियों का असर कंपनी की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ा।

मार्च 2026 में समाप्त वित्तीय वर्ष में कंपनी का टैक्स-पूर्व मुनाफा पिछले साल के करीब 2.5 अरब पाउंड से घटकर सिर्फ 1.4 करोड़ पाउंड रह गया। यानी कंपनी के मुनाफे में लगभग 99 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज हुई।

3. अमेरिका के टैरिफ ने बढ़ाया दबाव

अमेरिका की टैरिफ नीति ने भी जेएलआर के लिए मुश्किलें बढ़ाईं। ब्रिटेन से अमेरिका भेजी जाने वाली कारों पर शुरुआती तौर पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाया गया था।

इसके चलते कंपनी ने अप्रैल 2025 में अमेरिका के लिए अपनी कारों की शिपमेंट अस्थायी रूप से रोक दी थी।

बाद में दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते के तहत टैरिफ को घटाकर 10 फीसदी किया गया, लेकिन इसके बावजूद कंपनी को करीब 1.6 अरब पाउंड का टैरिफ झटका लगा।

जेएलआर के पास अमेरिका में स्थानीय असेंबली प्लांट नहीं है। इसलिए वहां उत्पादन करने वाली कुछ प्रतिस्पर्धी कंपनियों की तुलना में उस पर टैरिफ का असर ज्यादा पड़ा।

4. चीन में बिक्री का संकट

चीन कभी जेएलआर के लिए प्रमुख बाजारों में शामिल था, लेकिन अब यही बाजार कंपनी के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

वित्त वर्ष 2026 में चीन में जेएलआर की खुदरा बिक्री 25.4 फीसदी घट गई। इसके बाद वित्त वर्ष 2027 की जून तिमाही में भी बिक्री में सालाना आधार पर करीब 24 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

चीन में स्थानीय कंपनियां तेजी से इलेक्ट्रिक कारों और नई तकनीकों के साथ बाजार में आगे बढ़ रही हैं। बीवाईडी, श्याओमी, जीकर और हुआवे जैसी कंपनियां कम कीमत में तकनीक और कनेक्टिविटी से लैस इलेक्ट्रिक वाहन पेश कर रही हैं।

इससे पारंपरिक पश्चिमी लग्जरी कार ब्रांड्स पर प्रतिस्पर्धी दबाव बढ़ गया है।

5. इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बदलाव पड़ा भारी

जेएलआर ने अपनी ‘रीइमेजिन’ रणनीति के तहत इलेक्ट्रिक और कार्बन-न्यूट्रल भविष्य की दिशा में बढ़ने का फैसला किया।

इसके तहत कंपनी ने कई पुराने पेट्रोल और डीजल जगुआर मॉडल्स का उत्पादन बंद किया। समस्या यह है कि पुराने मॉडल बंद होने से तत्काल राजस्व पर दबाव पड़ा, जबकि नए इलेक्ट्रिक वाहनों को विकसित करने के लिए कंपनी को भारी निवेश करना पड़ रहा है।

यानी कंपनी को एक तरफ पुराने कारोबार से कम आमदनी का सामना करना पड़ रहा है और दूसरी तरफ भविष्य की इलेक्ट्रिक कारों के लिए बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करना पड़ रहा है।

संकट से निकलने के लिए 1.7 अरब पाउंड की लागत कटौती

मौजूदा वित्तीय दबाव से निपटने के लिए जेएलआर के सीईओ पीबी बालाजी ने करीब 1.7 अरब पाउंड की लागत कटौती की योजना बनाई है।

इसी योजना के तहत कंपनी अगले दो वर्षों में वैश्विक स्तर पर करीब 4,000 कर्मचारियों की छंटनी करेगी। इसमें मुख्य रूप से ऑफिस और मैनेजमेंट स्तर की नौकरियां प्रभावित होने की बात कही गई है।

कंपनी का लक्ष्य अपने खर्च को कम करना और ब्रेक-ईवन पॉइंट को नीचे लाना है, ताकि मौजूदा आर्थिक दबाव के बीच कारोबार को स्थिर किया जा सके।

सरकार ने बेलआउट से किया इनकार

जेएलआर की मुश्किलों के बीच ब्रिटिश सरकार ने कंपनी को करदाताओं के पैसे से किसी तरह का वित्तीय बेलआउट देने से आधिकारिक तौर पर इनकार किया है।

अब कंपनी के सामने चुनौती यह है कि वह लागत घटाने के साथ-साथ इलेक्ट्रिक वाहनों में निवेश, चीन में प्रतिस्पर्धा, अमेरिकी बाजार के टैरिफ और साइबर सुरक्षा जैसी समस्याओं से किस तरह निपटती है।

रतन टाटा के दौर में संकट से उबरकर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत करने वाली जेएलआर के लिए मौजूदा दौर एक बार फिर बड़ी परीक्षा बन गया है।

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