‘राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते भी मालेगांव और दाभोलकर मामलों में नहीं हो पाया न्याय’, पूर्व आईपीएस का दावा

पुणे: पूर्व आईपीएस अधिकारी मीरान बोरवणकर ने कहा है कि राजनीतिक हस्तक्षेप भी एक वजह रही, जिनके चलते मालेगांव और 7/11 विस्फोटों के पीड़ितों और नरेंद्र दाभोलकर के परिजनों को पूरा न्याय नहीं मिल सका। पुणे में डॉ. दाभोलकर की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी ने दावा किया कि उन्हें एक धमकी भरा ईमेल मिला था जिसमें कार्यक्रम में उनकी भागीदारी पर सवाल उठाया गया था।
हेमंत करकरे का दिया हवाला
बोरवणकर ने कहा कि मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त जूलियो रिबेरो ने पंजाब के एक अंग्रेजी दैनिक में एक लेख लिखा था कि मुंबई के पूर्व एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे ने उन्हें बताया था कि मालेगांव विस्फोट मामले में उन्हें दिल्ली के एक नेता से राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ था। बोरवणकर ने बताया कि रिबेरो ने लेख में लिखा है कि करकरे से उनकी बातचीत 2008 में 26/11 के हमलों में मुंबई एटीएस (आतंकवाद निरोधी दस्ते) प्रमुख की मौत से एक-दो दिन पहले ही हुई थी।
‘डॉ. दाभोलकर की हत्या के मास्टरमाइंड तक नहीं पहुंच पाई पुलिस’
उन्होंने कहा कि ‘इसी तरह, रोहिणी सालियान, जो एक ईमानदार, प्रतिबद्ध और जानकार वकील थीं, उन्हें एनआईए द्वारा मालेगांव विस्फोट मामले में अलग कर दिया गया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन पर केस में नरम रुख अपनाने का दबाव था। पूर्व आईपीएस अधिकारी ने दाभोलकर हत्या मामले में पुणे की एक अदालत की टिप्पणियों का भी हवाला दिया। बोरवणकर ने कहा ‘दो आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा और तीन अन्य को बरी करते हुए, न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अगर तीन आरोपियों को बरी कर दिया गया, तो मुख्य साज़िशकर्ता कौन था और डॉ. दाभोलकर की हत्या की साजिश किसने रची थी? न तो सीबीआई और न ही पुलिस मास्टरमाइंड तक पहुंच पाई। क्या यह नाकामी थी, या जानबूझकर की गई थी, या किसी शक्तिशाली व्यक्ति का कोई प्रभाव था?





