राहुल गांधी ने IDBI बैंक की बिक्री पर उठाए सवाल, मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर साधा निशाना

आईडीबीआई बैंक के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर सियासत तेज हो गई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में आवाज उठाते हुए केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस बैंक को देश के औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, उसे अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है।

राहुल गांधी ने बैंक कर्मचारियों को भेजे संदेश में बैंक की वित्तीय स्थिति, सरकारी हिस्सेदारी और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल संपत्ति नहीं, बल्कि देश के विकास और आर्थिक मजबूती के महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

राहुल गांधी ने सरकार से क्या पूछा?

राहुल गांधी के मुताबिक, पिछले साल मार्च में आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने संसद भवन में उनसे मुलाकात की थी। प्रतिनिधिमंडल ने सवाल उठाया था कि कर्मचारियों की मेहनत से मुनाफे में लौटे बैंक को सरकार क्यों बेचना चाहती है।

राहुल गांधी ने इस मुद्दे को लोकसभा में भी उठाया था। उन्होंने बैंक के निजीकरण की जरूरत और कर्मचारियों तथा जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा को लेकर सवाल किए। उनका कहना है कि सरकार की ओर से इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राहुल गांधी ने लिखा कि आईडीबीआई की स्थापना देश में उद्योगों को खड़ा करने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस के समय बैंक बनाए जाते थे, जबकि मौजूदा सरकार के दौर में उन्हें बेचा जा रहा है। उन्होंने बैंक कर्मचारियों के साथ खड़े रहने की बात भी कही।

आईडीबीआई बैंक की बिक्री से कितना बदलेगा नियंत्रण?

आईडीबीआई बैंक में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की बड़ी हिस्सेदारी है। बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया के तहत सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाकर निजी निवेशक को नियंत्रण सौंपने की योजना बना रही है।

प्रस्तावित सौदे के तहत सरकार और एलआईसी की संयुक्त हिस्सेदारी घटकर करीब 34 प्रतिशत रह जाने का दावा किया गया है। इससे बैंक का प्रबंधन और नियंत्रण निजी हाथों में जा सकता है।

इस प्रक्रिया को लेकर बैंक कर्मचारियों और विपक्ष की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, सौदे की अंतिम शर्तों और हिस्सेदारी के आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।

घाटे से 9,000 करोड़ रुपये के मुनाफे तक का सफर

राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के वित्तीय प्रदर्शन का हवाला देते हुए कहा कि कर्मचारियों की मेहनत से बैंक ने अपनी स्थिति में सुधार किया है। उनके अनुसार, कुछ साल पहले तक घाटे का सामना कर रहा बैंक पिछले साल 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाने में सफल रहा।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार हो चुका है, तो उसे निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों है।

2003 में संसद में दिए गए आश्वासन का मुद्दा

राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी को लेकर वर्ष 2003 में संसद में दिए गए आश्वासन का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, उस समय सरकार ने बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम से कम 51 प्रतिशत बनाए रखने की बात कही थी।

राहुल गांधी का तर्क है कि संसद में दिए गए आश्वासन का महत्व होता है और सरकार को इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

निजीकरण से आरक्षण और कर्मचारियों के अधिकारों पर चिंता

राहुल गांधी ने बैंक के निजीकरण के संभावित सामाजिक प्रभावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण व्यवस्था तथा कर्मचारियों की सेवा शर्तों को लेकर चिंता जताई।

उनका कहना है कि निजीकरण के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में लागू आरक्षण व्यवस्था और कर्मचारियों को मिलने वाली सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। उन्होंने बैंक कर्मचारियों की मांगों का समर्थन करते हुए उनसे एकजुट रहने की अपील की।

IDBI बैंक की बिक्री पर आगे क्या होगा?

आईडीबीआई बैंक के निजीकरण को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज होने की संभावना है। राहुल गांधी ने सरकार से बैंक की बिक्री के औचित्य, कर्मचारियों के भविष्य और जमाकर्ताओं के हितों पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

दूसरी ओर, इस प्रस्तावित सौदे की प्रक्रिया, मूल्यांकन और अंतिम शर्तों को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही इसके आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जा सकेगा। फिलहाल, आईडीबीआई बैंक की बिक्री का मुद्दा आर्थिक फैसले के साथ-साथ राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है।

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