ब्रिक्स में भारत-चीन की दोस्ती से अमेरिका चिंतित? समिट को लेकर अमेरिकी मीडिया ने जताई बड़ी चिंता

नई दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर अमेरिका और पश्चिमी देशों की नजर बनी हुई है। अमेरिकी मीडिया में सम्मेलन को बदलते वैश्विक समीकरणों और भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में अहम बताया गया है। खास तौर पर यह चर्चा है कि ब्रिक्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग में से कौन विकासशील देशों की अधिक प्रभावशाली आवाज बनकर उभरता है।

अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, चीन ब्रिक्स को अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने वाले मंच के तौर पर देखता है। वहीं भारत चाहता है कि यह समूह खुला और व्यापक बना रहे, ताकि देशों को अमेरिका या चीन में से किसी एक खेमे को चुनने के लिए मजबूर न होना पड़े।

चीन की चिंता क्या है?

अमेरिकी मीडिया में भारत के अमेरिका के साथ बढ़ते संबंधों को चीन की प्रमुख चिंताओं में से एक बताया गया है। स्टिमसन सेंटर की चीन विशेषज्ञ युन सन के अनुसार, बीजिंग दिल्ली के साथ संबंध सुधारने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहेगा। युद्ध, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, अमेरिकी टैरिफ और एआई जैसी चुनौतियां भी देशों को अपनी विदेश नीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर रही हैं।

भारत-अमेरिका रिश्तों में तनाव का असर

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत और चीन के अमेरिका के साथ संबंधों में आई अनिश्चितता को दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव कम करने के अवसर के रूप में देखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों में गिरावट आई है। रूसी तेल की खरीद जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ाया।

हालांकि भारत-चीन संबंधों में सुधार की राह आसान नहीं है। सीमा विवाद, पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी संबंध और हिंद महासागर में सुरक्षा प्रतिस्पर्धा दोनों देशों के बीच चुनौती बने हुए हैं।

ब्रिक्स में संतुलन साधना भारत के लिए चुनौती

वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एपी की रिपोर्टों में ब्रिक्स सम्मेलन को भारत के लिए संतुलन साधने वाली कवायद बताया गया है। सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और शी जिनपिंग जैसे नेता शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिक्स के सदस्य वैश्विक व्यवस्था में अधिक प्रभाव चाहते हैं, लेकिन उनके राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति संबंधी हित अलग-अलग हैं।

भारत एक ओर रूस और ईरान के साथ अपने पुराने संबंध बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी साझेदारी बढ़ा रहा है। ऐसे में ब्रिक्स के भीतर भारत के लिए सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती है।

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