डीमैट 2.0 से आसान होगा कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश, छोटे निवेशकों को मिल सकता है सुरक्षित विकल्प

भारतीय पूंजी बाजार में कॉरपोरेट बॉन्ड के कारोबार को लेकर बड़ा बदलाव शुरू हुआ है। सेबी और आरबीआई ने मुंबई में आयोजित ग्लोबल फिनटेक फेस्ट के दौरान कॉरपोरेट बॉन्ड के टोकनीकरण पर आधारित पायलट प्रोजेक्ट ‘डीमैट 2.0’ लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य बॉन्ड जारी करने, खरीदने, ट्रेडिंग और निपटान की प्रक्रिया को तेज, डिजिटल और अधिक पारदर्शी बनाना है।
क्या है डीमैट 2.0?
डीमैट 2.0 एक नया मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसके तहत कॉरपोरेट बॉन्ड को डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नोलॉजी यानी सुरक्षित साझा डिजिटल बही-खाते पर डिजिटल टोकन के रूप में तैयार किया जाएगा। इस डिजिटल लेजर का मालिकाना हक डिपॉजिटरी के पास होगा। बॉन्ड से जुड़ी जानकारी अधिकृत संस्थानों को एक साथ और तुरंत उपलब्ध होगी, जिससे गड़बड़ी की संभावना कम होगी।
निवेशकों और कंपनियों को क्या फायदा?
पारंपरिक व्यवस्था में बॉन्ड जारी करने और उसके निपटान में आमतौर पर दो से तीन दिन लगते थे। डीमैट 2.0 में तत्काल निपटान की व्यवस्था होगी। इससे जारीकर्ता को बोली लगाने के दिन ही फंड मिल सकेगा और सेकेंडरी मार्केट में निवेशकों को भी फंड तुरंत प्राप्त होगा। स्वचालन से जारी करने और सर्विसिंग की लागत घटने के साथ बाजार मध्यस्थों के लिए फाइल शेयरिंग, मिलान और सत्यापन का बोझ भी कम होगा।
इस व्यवस्था से निपटान जोखिम भी कम होगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश का बाजार जोखिम खत्म हो जाएगा। परियोजना का उद्देश्य मुख्य रूप से लेनदेन और निपटान की प्रक्रिया को अधिक तेज और कुशल बनाना है।
तीन कंपनियों ने जारी किए 1,025 करोड़ के टोकनयुक्त बॉन्ड
अब तक तीन कंपनियां कुल 1,025 करोड़ रुपये के टोकनयुक्त बॉन्ड जारी कर चुकी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की एनबीएफसी आरईसी लिमिटेड ने सात सितंबर को 18 निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाकर पहली जारीकर्ता बनी। इसके बाद एलएंडटी लिमिटेड ने नौ सितंबर को चार निवेशकों से 500 करोड़ रुपये जुटाए। निजी एनबीएफसी आईआईएफएल ने भी नौ सितंबर को एक निवेशक से 25 करोड़ रुपये जुटाए और तीसरी जारीकर्ता बनी।
निवेशकों की सुरक्षा में बदलाव नहीं
डीमैट 2.0 आने के बावजूद निवेशकों के मौजूदा सुरक्षा उपायों में बदलाव नहीं होगा। कानून की नजर में बॉन्ड वही साधन रहेगा और कंपनी की चुकौती की जिम्मेदारी पहले की तरह बनी रहेगी। निवेशकों के अधिकार भी अपरिवर्तित रहेंगे।





