शानदार शुरुआत और दमदार फिनिश, लेकिन बीच में ढीली पड़ी कहानी

अजय देवगन की हालिया फिल्मोग्राफी देखी जाए तो ऐसा लगता है कि वह अपनी फिल्मों में दूसरे नंबर के हीरो बनते जा रहे हैं। ‘रेड 2’ और ‘सन ऑफ सरदार 2’ के बाद अब वह लेकर आए हैं ‘दे दे प्यार दे 2’, जो 2019 में आई फिल्म का सीक्वल है। छह साल बाद आए इस पार्ट में नए कलाकारों को जोड़ा गया है और फिल्म को ज्यादा बड़ा और मॉडर्न टच देने का प्रयास किया गया है। लेकिन सवाल यही—क्या मेकर्स इस कोशिश में सफल रहे? और क्या यह सीक्वल पहली फिल्म से बेहतर है? जानिए पूरा रिव्यू…

कहानी

कहानी वहीं से आगे बढ़ती है, जहां पहली फिल्म खत्म हुई थी। आयशा (रकुल प्रीत सिंह) आशीष (अजय देवगन) के परिवार से मिल चुकी है और अब बारी है आशीष के आयशा के परिवार से मिलने की। आयशा की फैमिली चंडीगढ़ में रहती है—पिता (आर. माधवन), मां (गौतमी कपूर), भाभी (इशिता दत्ता) और भाई (तरुण गहलोत) के साथ।

परिवार में खुशी का माहौल है क्योंकि भाभी प्रेग्नेंट हैं। इस बीच आयशा अपने 52 वर्षीय बॉयफ्रेंड आशीष से परिवार को मिलवाना चाहती है। उम्र के इस बड़े अंतर पर आयशा का परिवार कैसे रिएक्ट करता है? क्या वे आशीष को स्वीकार करेंगे या नहीं? यही इस 2 घंटे 26 मिनट की फिल्म का मूल प्लॉट है।

कैसा है निर्देशन और स्क्रीनप्ले?

फिल्म का स्क्रीनप्ले काफी हद तक प्रीडिक्टेबल है।
फर्स्ट हाफ हल्का-फुल्का, कॉमिक और एंटरटेनिंग है। यहां फिल्म एक अच्छी रोमांटिक कॉमेडी होने का भरोसा देती है। लेकिन सेकंड हाफ में कहानी लड़खड़ाने लगती है। मेकर्स इमोशन को ज़बरदस्ती शामिल करने के प्रयास में मुख्य प्लॉट से भटक जाते हैं।

कहानी खिंची हुई लगने लगती है और कई जगह उबाऊ हो जाती है। हालांकि अंतिम 15 मिनट एक बार फिर से दर्शकों को बांध लेते हैं और थिएटर से मुस्कुराते हुए निकलने का मौका देते हैं। पहली फिल्म की तुलना में यह पार्ट कमजोर साबित होता है।

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