पैकेट वही, मात्रा कम: महंगाई से बदली कंपनियों की रणनीति, जानिए ग्राहक कैसे हो रहे प्रभावित

त्योहारी सीजन में रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती लागत का असर अब सिर्फ कीमतों में ही नहीं, बल्कि सामान की पैकिंग में भी नजर आने लगा है। कई कंपनियां छोटे पैक की कीमत को पहले जैसा रखते हुए उसमें सामान की मात्रा घटा रही हैं। वहीं, बड़े पैक की कीमतों में सीधे बढ़ोतरी की जा रही है।
बिस्कुट, नमकीन, स्नैक्स, नूडल्स, साबुन, शैंपू, हेयर ऑयल, डिटर्जेंट, चीनी और चाय जैसे रोजमर्रा के उत्पादों में यह बदलाव देखने को मिल रहा है। छोटे पैक में कुछ मामलों में मात्रा 2 से 7 फीसदी तक घटाई जा रही है, जबकि बड़े पैक के दाम 5 से 6 फीसदी तक बढ़ाए जा रहे हैं। ऐसे में ग्राहक को भले ही पैकेट की कीमत पहले जैसी दिखाई दे, लेकिन उसके बदले मिलने वाला सामान कम हो जाता है।
कंपनियां मात्रा घटाने की रणनीति क्यों अपना रही हैं?
एफएमसीजी कंपनियों के सामने एक तरफ उत्पादन लागत बढ़ने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ ग्राहकों की कीमत को लेकर संवेदनशीलता भी बनी हुई है। पाम ऑयल, पैकेजिंग सामग्री, कच्चे तेल से जुड़े उत्पादों और दूसरी जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी से कंपनियों की लागत बढ़ी है।
ऐसे में कंपनियां छोटे पैक की कीमत सीधे बढ़ाने से बच रही हैं। इसकी जगह पैकेट में मौजूद सामान की मात्रा कम करना उनके लिए अपेक्षाकृत आसान विकल्प माना जा रहा है। इससे पैकेट की कीमत वही दिखाई देती है, लेकिन प्रति पैकेट मिलने वाली मात्रा कम हो जाती है।
किन सामानों पर दिख रहा असर?
इस बदलाव का असर बिस्कुट, नमकीन, स्नैक्स, नूडल्स, हेयर ऑयल, साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, चीनी और चाय जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं पर देखने को मिल रहा है।
बीकाजी फूड्स के मनोज वर्मा के मुताबिक, पिछले छह-सात महीनों में औसत कच्चे माल की लागत करीब 7 फीसदी बढ़ी है। पाम ऑयल, पैकेजिंग और दूसरी जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी को इसकी प्रमुख वजह बताया गया है।
यानी कंपनियों पर बढ़ती लागत का दबाव है और उसका असर किसी न किसी रूप में ग्राहकों तक पहुंच रहा है।
दूध और घी भी हो सकते हैं महंगे
त्योहारी सीजन में डेयरी उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ रहा है। पारस डेयरी के विपणन अधिकारी वीपीएस मलिक के मुताबिक, त्योहारों के दौरान दूध की कीमत में 3 रुपये प्रति लीटर तक की और बढ़ोतरी हो सकती है।
वहीं, घी की कीमत पहले ही 25 से 30 रुपये प्रति किलो बढ़ चुकी है। इसमें इतनी ही और बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। दूध और घी की नियमित खपत करने वाले परिवारों के बजट पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। त्योहारों में मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में डेयरी उत्पादों की मांग बढ़ने से भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
10, 20 और 50 रुपये वाले पैक क्यों हैं अहम?
डाटा रिसर्च फर्म नीलसन इंडिया के प्रीतम भादुड़ी के मुताबिक, कंपनियों के लिए 10, 20 और 50 रुपये वाले छोटे पैक काफी महत्वपूर्ण हैं। इन पैकों की कीमत बढ़ने पर ग्राहक को सामान तुरंत महंगा महसूस हो सकता है।
इसी वजह से कंपनियां इन पैकों की कीमत में बदलाव करने के बजाय कई बार मात्रा कम करने का रास्ता अपनाती हैं। ग्राहक को पैकेट की कीमत पहले जितनी ही नजर आती है, लेकिन उसे पहले के मुकाबले कम सामान मिलता है।
इसके उलट बड़े पैक में कीमत बढ़ाने की गुंजाइश ज्यादा होती है। आधुनिक रिटेल और ई-कॉमर्स में बिकने वाले बड़े पैकों की कीमत में कंपनियां बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा सीधे ग्राहक पर डाल सकती हैं।
ग्राहक पर क्या पड़ेगा असर?
इस रणनीति का असर ग्राहक की जेब पर सिर्फ बढ़ी हुई कीमत के रूप में नहीं, बल्कि कम मात्रा में सामान मिलने के रूप में भी पड़ता है। यदि पैकेट की कीमत समान रहती है लेकिन उसमें सामान कम हो जाता है, तो वास्तव में प्रति ग्राम या प्रति यूनिट उत्पाद की कीमत बढ़ जाती है।
ऐसे में खरीदारी करते समय सिर्फ पैकेट पर लिखी कीमत देखने के बजाय उसकी नेट मात्रा और प्रति किलो या प्रति लीटर कीमत पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। इससे ग्राहक को अलग-अलग पैक के बीच वास्तविक कीमत का अंतर समझने में मदद मिल सकती है।





