भारत के हाथ लगी अमेरिकी जैवलिन मिसाइल: क्यों खरीदी गई, क्या है इसकी ताकत? समझें पूरा मामला

भारत और अमेरिका के बीच एक अहम रक्षा समझौते के तहत भारतीय सेना को करीब 60 जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें मिलेंगी। यह खरीद ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना को मिली आपातकालीन खरीद शक्तियों के तहत की गई है। करीब 292 करोड़ रुपये के इस समझौते के तहत मिसाइलों की डिलीवरी वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है।
जैवलिन दुनिया की चर्चित एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में शामिल है। इसे खासतौर पर टैंकों और दूसरे बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत ने इस मिसाइल को क्यों चुना और इसकी ऐसी कौन-सी खूबियां हैं जो इसे खास बनाती हैं?
क्या है जैवलिन मिसाइल?
जैवलिन एक सैनिक द्वारा ले जाकर दागी जा सकने वाली मध्यम दूरी की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली है। इसे कंधे से लॉन्च किया जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करना है।
इसके अलावा इसका इस्तेमाल बंकर, किलेबंद ठिकानों और गुफाओं जैसे लक्ष्यों के खिलाफ भी किया जा सकता है। इस प्रणाली को अमेरिका के लिए लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन के संयुक्त उद्यम ने विकसित किया है।
जैवलिन की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
इस मिसाइल की सबसे चर्चित विशेषता इसकी ‘दागो और भूल जाओ’ क्षमता है। यानी सैनिक लक्ष्य पर मिसाइल लॉक करके उसे दागने के बाद लगातार उसका मार्गदर्शन करने के लिए उसी जगह मौजूद रहने को मजबूर नहीं होता।
मिसाइल का मार्गदर्शन तंत्र खुद लक्ष्य को पकड़कर उसका पीछा करता है। इससे मिसाइल लॉन्च करने के तुरंत बाद सैनिक अपनी जगह बदल सकता है और सुरक्षित स्थान पर जा सकता है।
दिन-रात लक्ष्य पहचानने की क्षमता
जैवलिन प्रणाली में कमान प्रक्षेपण इकाई होती है, जो सैनिक को लक्ष्य देखने, उसकी निगरानी करने और मिसाइल को लॉक करने में मदद करती है।
इसमें दिन के समय लक्ष्य देखने की क्षमता के साथ रात में गर्मी के आधार पर लक्ष्य की पहचान करने वाली अवरक्त प्रणाली भी मौजूद है। इसलिए इसका इस्तेमाल दिन और रात दोनों समय किया जा सकता है।
कितनी है जैवलिन की मारक क्षमता?
सीएसआईएस के अनुसार, जैवलिन की मानक प्रभावी मारक दूरी करीब 2.5 किलोमीटर है। उन्नत हल्की कमान प्रक्षेपण इकाई के साथ इसकी मारक क्षमता करीब 4.5 किलोमीटर तक पहुंच सकती है।
मिसाइल की लंबाई करीब 1.2 मीटर, व्यास 127 मिलीमीटर और लॉन्च के समय वजन लगभग 22.1 किलोग्राम है। इसमें करीब 8.4 किलोग्राम का टैंडम-चार्ज उच्च विस्फोटक एंटी-टैंक वारहेड होता है।
टैंक के ऊपर से क्यों करती है हमला?
जैवलिन की एक खास तकनीक इसका ऊपर से हमला करने वाला तरीका है। मिसाइल लक्ष्य की तरफ बढ़ते हुए ऊपर उठती है और फिर टैंक के ऊपरी हिस्से को निशाना बनाती है।
टैंक का ऊपरी हिस्सा आमतौर पर उसके सामने वाले हिस्से की तुलना में कम बख्तरबंद होता है। ऐसे में मिसाइल टैंक के अपेक्षाकृत कमजोर हिस्से पर हमला करके उसे नुकसान पहुंचा सकती है।
जैवलिन में सीधे हमले का विकल्प भी मौजूद है, जिसका इस्तेमाल बंकर, इमारत और किलेबंद ठिकानों जैसे लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।
टैंक का कवच कैसे भेदती है?
जैवलिन में टैंडम-चार्ज वारहेड लगाया गया है, जिसे बख्तरबंद वाहनों के सुरक्षा कवच को भेदने के लिए डिजाइन किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह 30 इंच यानी करीब 762 मिलीमीटर से अधिक रोल्ड होमोजीनियस स्टील के बराबर कवच को भेदने में सक्षम है।
बंकर से भी दागी जा सकती है मिसाइल
जैवलिन में कम दबाव वाली शुरुआती प्रक्षेपण तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। मिसाइल को पहले कम शक्ति से प्रक्षेपण नली से बाहर निकाला जाता है और इसके बाद मुख्य मोटर सक्रिय होती है।
इस तकनीक के कारण इसे इमारत या बंकर जैसी सीमित जगह से भी लॉन्च किया जा सकता है। इससे पीछे निकलने वाली गैस और धुआं कम होता है और लॉन्च करने वाले सैनिक की स्थिति का तुरंत पता चलने की संभावना घटती है।
भारत ने जैवलिन क्यों खरीदी?
भारत के लिए इस खरीद का सबसे अहम पहलू सेना की एंटी-टैंक क्षमता को मजबूत करना है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद आपातकालीन खरीद के तहत जैवलिन को शामिल किया गया है। इसकी पोर्टेबल डिजाइन, लक्ष्य को लॉक करने के बाद खुद मार्गदर्शन करने की क्षमता और टैंक के ऊपरी हिस्से पर हमला करने की तकनीक इसे युद्धक्षेत्र में उपयोगी बनाती है।
भारत को अभी सीमित संख्या में जैवलिन मिसाइलें मिलेंगी। हालांकि, अमेरिका और भारत के बीच भविष्य में इसके सह-उत्पादन की संभावना पर भी काम हो रहा है। फरवरी 2025 में जैवलिन बनाने वाली कंपनियों और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के बीच भारत में इसके निर्माण की संभावनाएं तलाशने के लिए समझौता हुआ था।
यूक्रेन युद्ध में भी खूब हुई चर्चा
जैवलिन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा चर्चा यूक्रेन युद्ध के दौरान मिली। अमेरिका ने 2018 से यूक्रेन को जैवलिन मिसाइलें देना शुरू किया था। रूस के फरवरी 2022 में बड़े सैन्य हमले के बाद अमेरिका ने यूक्रेन को बड़ी संख्या में ये मिसाइलें उपलब्ध कराईं।
यूक्रेन में जैवलिन युद्ध के दौरान प्रतिरोध के एक चर्चित प्रतीक के रूप में भी सामने आई।
किन देशों के पास है जैवलिन?
अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, फ्रांस, जॉर्जिया, इंडोनेशिया, आयरलैंड, जॉर्डन, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, ओमान, पोलैंड, कतर, सऊदी अरब, ताइवान, यूक्रेन, संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन समेत कई देश जैवलिन का इस्तेमाल करते हैं।
अमेरिका इसे लंबे समय तक अपने हथियार भंडार में बनाए रखने की योजना पर काम कर रहा है। सीएसआईएस के अनुसार, यह प्रणाली कम से कम 2050 तक अमेरिकी सेना में रहने वाली है।
भारत में भी बन सकती है जैवलिन
मौजूदा खरीद भारतीय सेना की तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए है। हालांकि भारत और अमेरिका जैवलिन के भारत में सह-उत्पादन की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं।
अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो भारत को मिसाइल के निर्माण से जुड़ी औद्योगिक क्षमता और तकनीकी सहयोग बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। साथ ही इससे भविष्य में ऐसी प्रणालियों के लिए विदेशी निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।





