मौन ध्रुवीकरण की रणनीति के साथ मैदान में भाजपा, केरल में उलटफेर की तैयारी

केरल के राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी नए प्रयोगों के साथ अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। राज्य के पारंपरिक ‘लाल दुर्ग’ में सेंध लगाने के लिए पार्टी और संघ परिवार ‘मौन सांस्कृतिक ध्रुवीकरण’ की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
इस रणनीति के केंद्र में केरल की प्रख्यात संत Mata Amritanandamayi हैं, जिन्हें ‘अम्मा’ के नाम से जाना जाता है। हालांकि अम्मा सार्वजनिक रूप से राजनीतिक तटस्थता बनाए रखती हैं, लेकिन प्रधानमंत्री Narendra Modi के साथ उनके आत्मीय संबंध राज्य के सामाजिक समीकरणों पर असर डाल सकते हैं।
अयोध्या दौरे से गया सांस्कृतिक संदेश
हाल ही में अम्मा अपने एक हजार से अधिक अनुयायियों के साथ Ayodhya पहुंचीं, जहां उन्होंने राम मंदिर में आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लिया और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ मंच साझा किया। इस दौरे को केरल के तटस्थ हिंदू मतदाताओं के लिए एक मजबूत सांस्कृतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
इससे पहले हरियाणा में अमृता अस्पताल के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अम्मा से आशीर्वाद लिया था, जिसकी व्यापक चर्चा हुई थी।
धीवर समुदाय पर फोकस
अम्मा का संबंध केरल के धीवर (मछुआरा) समुदाय से है, जो लंबे समय से वामपंथी राजनीति का आधार माना जाता रहा है। ऐसे में भाजपा नेताओं का अम्मा के प्रति सम्मान जताना इन समुदायों को साधने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसे जातिगत पहचान को व्यापक हिंदू पहचान से जोड़ने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
‘हिंदू एकता’ के प्रयास तेज
राज्य में विभिन्न हिंदू जातियों को एक मंच पर लाने के लिए संघ परिवार द्वारा ‘हिंदू एकता सम्मेलन’ जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। हाल ही में नेमम विधानसभा क्षेत्र में ऐसा ही एक सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों की भागीदारी देखी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि आध्यात्मिकता, समाज सेवा और राजनीतिक रणनीति के इस मिश्रण के जरिए भाजपा केरल में नई जमीन तैयार करने की कोशिश कर रही है। आने वाले चुनावों में यह प्रयोग कितना सफल होता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
क्यों खास हैं ‘अम्मा’
‘हगिंग सेंट’ के नाम से प्रसिद्ध माता अमृतानंदमयी अब तक करोड़ों लोगों को व्यक्तिगत रूप से आलिंगन दे चुकी हैं। सामाजिक सेवा, आपदा राहत और वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका के कारण उनका प्रभाव केरल से बाहर भी व्यापक है।
कोल्लम के वल्लिकावु स्थित उनके आश्रम में हजारों साधक रहते हैं, जिनमें बड़ी संख्या विदेशी अनुयायियों की भी है। यही व्यापक सामाजिक प्रभाव उन्हें केरल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कारक बनाता है।





