केस बैकलॉग कम करने को Justice B.V. Nagarathna ने दिए अहम सुझाव

सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश Justice B.V. Nagarathna ने देश की न्यायपालिका में बढ़ते लंबित मामलों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने एक ‘न्यायिक सुधार आयोग’ के गठन का सुझाव दिया है।
शनिवार को Supreme Court Bar Association (एससीबीए) द्वारा आयोजित ‘न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थाओं को मजबूत करना’ विषय पर पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने यह बात कही।
आयोग में किन-किन को शामिल करने का सुझाव
जस्टिस नागरत्ना ने बताया कि प्रस्तावित आयोग में सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों और जिला न्यायपालिका के प्रतिनिधियों के साथ-साथ बार के सदस्य भी शामिल होने चाहिए। इसके अलावा महान्यायवादी, सॉलिसिटर जनरल और बार के संस्थागत प्रतिनिधियों को भी इसका हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि प्रभावी समन्वय के लिए सरकार का प्रतिनिधित्व भी आवश्यक है।
देरी के पीछे क्या हैं कारण
जस्टिस नागरत्ना ने न्यायिक प्रक्रिया में देरी के पीछे विभिन्न हितधारकों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कई बार वादी यथास्थिति बनाए रखने के लिए मामलों को लंबा खींचते हैं, जबकि वकील स्थगन (adjournment) से लाभान्वित होते हैं।
वहीं, सरकारी विभाग अक्सर जिम्मेदारी से बचने के लिए अपील करते रहते हैं, जिससे मामलों की संख्या बढ़ती जाती है। निचली अदालतों के न्यायाधीश भी अपील में फैसले पलटने के डर से सतर्क रवैया अपनाते हैं, जिससे निपटान की गति धीमी हो जाती है।
‘सिस्टमेटिक बदलाव’ की जरूरत
उन्होंने स्पष्ट कहा कि केवल प्रक्रियात्मक सुधार या व्यक्तिगत प्रयासों से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए संस्थागत स्तर पर हस्तक्षेप जरूरी है, जिसे एक न्यायिक आयोग के जरिए लागू किया जा सकता है।
लंबित मामलों पर अहम सुझाव
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी सुझाव दिया कि दोषपूर्ण (defective) मामलों को तब तक लंबित मामलों की गिनती में शामिल नहीं किया जाना चाहिए, जब तक वे सुनवाई के लिए पूरी तरह तैयार न हों।
उन्होंने सरकार को मुकदमेबाजी का सबसे बड़ा स्रोत बताते हुए कहा कि कई बार अधिकारी जांच से बचने के लिए अनावश्यक अपील करते हैं, जिससे मामलों का बोझ और बढ़ता है।





