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शेयर बाजार में हालिया उतार-चढ़ाव के बीच उन निवेशकों की चिंता बढ़ गई है, जिनके पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा इक्विटी में है। अगर किसी निवेशक के पोर्टफोलियो में करीब 90% हिस्सा इक्विटी का हो गया है, तो बाजार से पूरी तरह बाहर निकलने के बजाय पोर्टफोलियो को दोबारा संतुलित करना बेहतर विकल्प हो सकता है।

कई निवेशकों के पोर्टफोलियो में समय के साथ इक्विटी का हिस्सा बढ़ जाता है। बाजार में तेजी के दौरान यह स्थिति फायदेमंद नजर आती है, लेकिन गिरावट आने पर जोखिम का एहसास होता है। इसे पोर्टफोलियो ड्रिफ्ट कहा जाता है।

बाजार की गिरावट से घबराने की जरूरत नहीं

भारतीय शेयर बाजार इस समय कई चुनौतियों से गुजर रहा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और रुपये पर दबाव जैसे कारणों से बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।

हालांकि, घरेलू अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी हुई है और निवेशक SIP के जरिए लगातार म्यूचुअल फंड में पैसा लगा रहे हैं। ऐसे में केवल बाजार में गिरावट देखकर निवेश बंद करना जरूरी नहीं है।

90% इक्विटी है तो क्या करें?

अगर आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा आपकी जोखिम क्षमता से ज्यादा हो गया है, तो अचानक सभी निवेश बेचने के बजाय री-बैलेंसिंग पर विचार किया जा सकता है।

इसके लिए नई SIP का कुछ हिस्सा डेट या अन्य अपेक्षाकृत स्थिर एसेट क्लास में लगाया जा सकता है। वहीं, जिन निवेशकों का कोई बड़ा वित्तीय लक्ष्य नजदीक है, वे इक्विटी में जोखिम कम करके सुरक्षित और अधिक तरल विकल्पों की ओर पैसा शिफ्ट करने पर विचार कर सकते हैं।

SIP बंद करना जरूरी नहीं

बाजार में गिरावट के दौरान घबराकर SIP बंद करना लंबे समय में नुकसानदायक हो सकता है। SIP जारी रखने से बाजार के अलग-अलग स्तरों पर निवेश होता रहता है। हालांकि, अगर मौजूदा पोर्टफोलियो निवेशक की जोखिम क्षमता और वित्तीय लक्ष्यों के अनुरूप नहीं है, तो SIP का आवंटन बदला जा सकता है।

पोर्टफोलियो में विविधता जरूरी

अगर पोर्टफोलियो में मिड-कैप और स्मॉल-कैप फंड का हिस्सा बहुत ज्यादा है, तो कुछ रकम को लार्ज-कैप, फ्लेक्सी-कैप, हाइब्रिड या डेट जैसे विकल्पों में शिफ्ट करके जोखिम को संतुलित किया जा सकता है। जरूरत के अनुसार गोल्ड या इंटरनेशनल निवेश के जरिए भी डायवर्सिफिकेशन किया जा सकता है।

हालांकि, किसी भी निवेशक के लिए एक जैसा एसेट एलोकेशन सही नहीं होता। निवेश का फैसला वित्तीय लक्ष्य, निवेश की अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: बाजार की गिरावट को देखकर घबराकर SIP या म्यूचुअल फंड से पूरी तरह बाहर निकलने के बजाय पहले अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करें। अगर इक्विटी का हिस्सा जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है, तो री-बैलेंसिंग बाजार से भागने के बजाय जोखिम को व्यवस्थित करने का बेहतर तरीका हो सकता है।

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