रूस में महंगाई और टैक्स की दोहरी मार का खतरा? यूक्रेन युद्ध के खर्च ने बढ़ाई सरकार की चिंता, कंपनियों पर भी पड़ सकता है असर

यूक्रेन के साथ जारी युद्ध का आर्थिक बोझ रूस की सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है। सैन्य खर्च में बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सरकार राजस्व बढ़ाने के नए रास्ते तलाश रही है। इसी कड़ी में 2027 से 2029 तक के बजट के साथ कई नए कर प्रस्ताव पेश किए गए हैं। इनका असर मुख्य रूप से खनन कंपनियों, संपन्न निवेशकों और विदेशी सामान खरीदने वाले उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।
रूस के बजट घाटे में बढ़ोतरी के पीछे सैन्य खर्च के अलावा अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, ऊंची ब्याज दरें, श्रमिकों की कमी और ऊर्जा क्षेत्र पर बढ़ता दबाव भी प्रमुख कारण हैं। ऐसे में सरकार के सामने युद्ध के लिए धन जुटाने के साथ अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने की चुनौती है।
बजट घाटे ने बढ़ाई सरकार की चिंता
कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त तक रूस का बजट घाटा बढ़कर 5.8 ट्रिलियन रूबल यानी करीब 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। यह पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत अधिक है। घाटे का यह आंकड़ा सरकार के संशोधित लक्ष्य 4.8 ट्रिलियन रूबल से भी ज्यादा है।
रूस की अर्थव्यवस्था पर सैन्य गतिविधियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। प्रतिबंधों और ऊंची ब्याज दरों के कारण सैन्य क्षेत्र से बाहर की कंपनियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, यूक्रेन की ओर से रूसी तेल रिफाइनरियों और निर्यात टर्मिनलों पर किए गए हमलों ने भी आर्थिक चुनौतियां बढ़ाई हैं।
खनन कंपनियों और अमीर निवेशकों पर बढ़ सकता है टैक्स
रूस सरकार के नए प्रस्तावों के तहत खनन कंपनियों से अतिरिक्त कर वसूली की तैयारी है। इसमें लौह अयस्क, निकेल और सोने का उत्पादन करने वाली कंपनियां शामिल हैं। प्रस्ताव के अनुसार, कीमतों में बढ़ोतरी से अप्रत्याशित मुनाफा कमाने वाली कंपनियों पर 20 से 30 प्रतिशत तक कर लगाया जा सकता है।
इसके अलावा, निवेश से मिलने वाले ब्याज, लाभांश और संपत्ति बेचने से होने वाली आय पर भी टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव है। इससे संपन्न निवेशकों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
सरकार इससे पहले भी व्यापक स्तर पर टैक्स बढ़ा चुकी है। पिछले साल मूल्य वर्धित कर (वैट) में बढ़ोतरी की गई थी और अधिक छोटे कारोबारों को इसके दायरे में लाया गया था। अब सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों पर कर का बोझ डालने की रणनीति अपना रही है।
विदेशी सामान खरीदना भी हो सकता है महंगा
नए प्रस्तावों के तहत ऑनलाइन खरीदे जाने वाले कुछ विदेशी सामानों पर भी टैक्स लगाने की योजना है। रिपोर्ट के मुताबिक, 200 यूरो से कम कीमत वाले विदेशी सामान पर 22 प्रतिशत वैट लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अलावा, प्रत्येक पार्सल पर 100 रूबल शुल्क लगाने की भी योजना है।
एक अन्य प्रस्ताव के तहत रूस के तथाकथित ‘अमित्र देशों’ के विदेशी निवेशकों के प्रतिबंधित खातों में दिए जाने वाले लाभांश पर 35 प्रतिशत टैक्स लगाने की बात कही गई है। इन प्रस्तावों का उद्देश्य सरकार की आय बढ़ाना और बजट घाटे को नियंत्रित करना है।
युद्ध के खर्च को लेकर जनता में नाराजगी
रूस की राजधानी मॉस्को में टैक्स बढ़ाने के प्रस्तावों पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने सरकार की वित्तीय जरूरतों को मजबूरी बताया, जबकि अन्य ने आम नागरिकों पर बढ़ते बोझ को लेकर नाराजगी जताई।
मॉस्को के निवासी डेनिस बिस्ट्रोव ने कहा कि सरकार को खजाने के लिए धन चाहिए और इसके लिए आम लोगों से अधिक वसूली की जा रही है। वहीं, कुछ नागरिकों का मानना है कि देश की मौजूदा परिस्थितियों में सरकार की वित्तीय जरूरतों में योगदान देना आवश्यक है।
आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक, टैक्स बढ़ने से सरकार को तत्काल राजस्व जुटाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे कारोबारियों और परिवारों की लागत भी बढ़ेगी।
सेना पर बढ़ता खर्च, दूसरे क्षेत्रों के लिए कम संसाधन
मैक्रो-एडवाइजरी लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी क्रिस वीफर के मुताबिक, रूस के पास 2027 और संभवत: 2028 में बजट घाटे को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं। हालांकि, इसके लिए सरकार को टैक्स बढ़ाने और परिवारों तथा कारोबारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
उनके अनुसार, बजट का बड़ा हिस्सा सेना और सैन्य अभियान पर खर्च होने से सामान्य आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के लिए संसाधन सीमित हो सकते हैं। सरकारी खर्च के सहारे अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्सों में वृद्धि बनी हुई है, लेकिन अन्य क्षेत्रों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
विदेशी कंपनियों पर भी बढ़ रहा सरकार का नियंत्रण
रूस में विदेशी कंपनियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ने के संकेत भी मिल रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मन खुदरा कंपनी मेट्रो की रूस स्थित सहायक कंपनी से युद्ध प्रयासों के लिए एक अरब रूबल का योगदान लिया गया। कंपनी के जर्मनी स्थित मुख्यालय ने कहा कि इस योगदान में उसकी कोई भूमिका नहीं थी।
रूस स्थित कंपनी के अनुसार, यह राशि सैनिकों के लिए वाहन, संचार उपकरण और ड्रोन रोधी उपकरण खरीदने में इस्तेमाल की जाएगी। इस घटनाक्रम ने विदेशी कंपनियों से अतिरिक्त राजस्व जुटाने की रूस सरकार की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं।
क्या रूस की आर्थिक स्थिति वास्तव में खराब है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, रूस की वित्तीय स्थिति फिलहाल स्थिर है, लेकिन सरकार के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। युद्ध के खर्च का एक हिस्सा बैंकों और सरकारी नियंत्रण वाली कंपनियों के माध्यम से भी उठाया जा रहा है। इसके अलावा, तेल और गैस से होने वाली कमाई से तैयार नेशनल वेल्थ फंड भी सरकार के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने का एक माध्यम है।
हालांकि, कीव स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अनुसार, इस फंड की उपलब्ध तरल संपत्तियां घटकर रूस की जीडीपी के 1.7 प्रतिशत के बराबर रह गई हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों में गिरावट या वित्तीय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होने जैसी परिस्थितियां रूस की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं।
निष्कर्ष: यूक्रेन युद्ध का बढ़ता खर्च रूस की अर्थव्यवस्था और सरकारी बजट पर दबाव डाल रहा है। टैक्स बढ़ाने और दूसरे वित्तीय उपायों से सरकार को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन सैन्य खर्च की लगातार बढ़ती जरूरतों के बीच आम जनता, कारोबारियों और निवेशकों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका बनी हुई है।





