उत्तराखंड: चमोली में गर्भवती को नहीं मिली समय पर मदद, डंडी के सहारे अस्पताल पहुंचाया; हेलीकॉप्टर का इंतजार

उत्तराखंड के चमोली जिले में सड़क सुविधा से वंचित पिनाऊं गांव की मुश्किलें एक बार फिर सामने आई हैं। बुधवार को गांव की आंगनबाड़ी कार्यकत्री खिमुली देवी को अचानक प्रसव पीड़ा हुई। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण ग्रामीणों को उन्हें डंडी के सहारे करीब छह किलोमीटर पैदल ले जाकर सड़क तक पहुंचाना पड़ा। इसके बाद ग्रामीणों ने हेलीकॉप्टर का इंतजार किया, लेकिन करीब साढ़े चार घंटे बाद भी हेलीकॉप्टर नहीं पहुंचा। आखिरकार गर्भवती को सड़क मार्ग से अस्पताल ले जाया गया।

छह किलोमीटर डंडी के सहारे तय किया रास्ता

पिनाऊं गांव से बलाण गांव तक का पैदल रास्ता भी क्षतिग्रस्त है। प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद ग्रामीणों ने पहले क्षतिग्रस्त रास्ते को दुरुस्त किया और खिमुली देवी को डंडी के सहारे बाहर निकाला। ग्रामीण उन्हें करीब छह किलोमीटर पैदल चलकर पाटिंगधार तक लेकर पहुंचे।

ग्राम प्रधान लखपत दानू के अनुसार, बुधवार सुबह करीब 11 बजे गर्भवती को डंडी के सहारे पाटिंगधार लाया गया। इसके बाद उन्हें उम्मीद थी कि हेलीकॉप्टर से जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सकेगा।

साढ़े चार घंटे तक हेलीकॉप्टर का इंतजार

पाटिंगधार पहुंचने के बाद ग्रामीण शाम करीब साढ़े पांच बजे तक हेलीकॉप्टर का इंतजार करते रहे। हेलीकॉप्टर नहीं पहुंचने पर ग्रामीणों ने गर्भवती को आगे सड़क मार्ग तक ले जाने का फैसला किया।

शाम करीब छह बजे उन्हें कालीताल सड़क मार्ग तक पहुंचाया गया। इसके बाद सड़क से वाहन के जरिए उन्हें देवाल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया।

रात साढ़े नौ बजे पहुंचे देवाल अस्पताल

लगातार कई घंटे की मशक्कत के बाद गर्भवती को रात करीब साढ़े नौ बजे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र देवाल पहुंचाया गया। हालांकि, वहां डॉक्टर उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें तत्काल आगे रेफर करना पड़ा। इसके बाद एंबुलेंस से गर्भवती को जिला अस्पताल बागेश्वर ले जाया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में ग्रामीणों को गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए पैदल रास्ता तय करना पड़ा और फिर अस्पताल तक पहुंचने में कई घंटे लग गए।

11 साल पहले मंजूर हुई थी सड़क

पिनाऊं गांव में सड़क सुविधा नहीं होने का मामला नया नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, गांव के लिए वर्ष 2015 में पूर्व विधायक स्वर्गीय शेर सिंह दानू के नाम पर 23 किलोमीटर लंबी धुराधारकोट-वांक-पिनाऊं सड़क को मंजूरी मिली थी। लेकिन मंजूरी के करीब 11 साल बाद भी सड़क निर्माण पूरा नहीं हो पाया है।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नहीं होने के कारण सामान्य दिनों में भी लोगों को परेशानी होती है, लेकिन बीमारी या प्रसव जैसी आपात स्थिति में मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है।

बीमार और गर्भवती महिलाओं को डंडी से ले जाने की मजबूरी

ग्राम प्रधान लखपत दानू ने बताया कि पिनाऊं गांव के लोगों को आए दिन मरीजों और गर्भवती महिलाओं को डंडी के सहारे अस्पताल तक पहुंचाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण के लिए पहले भी घोषणाएं हुईं, लेकिन अभी तक गांव तक सड़क नहीं पहुंच पाई है।

बुधवार को भी आशा कार्यकर्ता बिमला देवी सहित ग्रामीणों ने खिमुली देवी को डंडी के सहारे खतरनाक और क्षतिग्रस्त रास्ते से सड़क तक पहुंचाने में मदद की।

वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया का हवाला

लोक निर्माण विभाग थराली के अधिशासी अभियंता मनीष डोगरा के अनुसार, पिनाऊं के लिए स्वीकृत सड़क के रास्ते में बड़ी संख्या में बाज और बुरांश के पेड़ हैं। इसके चलते वन भूमि हस्तांतरण की कार्रवाई चल रही है।

उन्होंने बताया कि धुराधारकोट-वांक-पिनाऊं सड़क स्वीकृत है और लोहाजंग से वांक गांव तक सड़क बन चुकी है। ग्रामीणों की सहमति होने पर वांक गांव से पिनाऊं तक सड़क पहुंचाने के विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है।

पिनाऊं गांव की घटना ने पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत को एक बार फिर सामने ला दिया है। ग्रामीणों की मांग है कि सड़क निर्माण की प्रक्रिया जल्द पूरी हो, ताकि आपात स्थिति में मरीजों और गर्भवती महिलाओं को इस तरह जोखिम उठाकर अस्पताल न ले जाना पड़े।

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