मीराबाई चानू का अनोखा सफर: तीरंदाज बनने का था सपना, किताब से मिली नई राह और खत्म हुआ पदक का सूखा

भारत की स्टार भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में महिला 49 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उन्होंने कुल 198 किग्रा वजन उठाया। यह एशियन गेम्स में मीराबाई चानू का पहला पदक है। साथ ही, भारत को भारोत्तोलन में 28 साल बाद एशियाड पदक मिला है।
तीरंदाज बनना चाहती थीं मीराबाई
मणिपुर के नोंगपेक काकचिंग गांव में 8 अगस्त 1994 को जन्मीं मीराबाई चानू का बचपन संघर्षों के बीच बीता। वह पहाड़ से जलावन के लिए लकड़ियां चुनकर घर लाती थीं। बचपन से ही भारी सामान उठाने की आदत ने अनजाने में उन्हें उस खेल की ओर बढ़ने के लिए तैयार किया, जिसमें आगे चलकर उन्होंने देश के लिए बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं।
हालांकि, बचपन में मीराबाई का सपना तीरंदाज बनने का था। सातवीं कक्षा तक वह तीरंदाजी को ही अपना करियर बनाने के बारे में सोचती थीं। लेकिन आठवीं कक्षा में पढ़ी एक किताब ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
एक किताब में पढ़ी कुंजरानी देवी की कहानी
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आठवीं कक्षा की किताब में मीराबाई ने भारत की मशहूर भारोत्तोलक कुंजरानी देवी के बारे में पढ़ा। कुंजरानी देवी विश्व चैंपियनशिप में सात रजत पदक और एशियाई खेलों में दो कांस्य पदक जीत चुकी थीं।
कुंजरानी की उपलब्धियों के बारे में पढ़ने के बाद मीराबाई का रुझान भारोत्तोलन की ओर बढ़ा। शुरुआत में उन्हें लगा कि इसमें केवल वजन उठाना होता है, लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि भारोत्तोलन बेहद चुनौतीपूर्ण खेल है। इसके बावजूद उन्होंने इसी खेल में आगे बढ़ने का फैसला किया।
198 किलो वजन उठाकर जीता रजत
एशियन गेम्स 2026 में मीराबाई ने 49 किग्रा वर्ग में कुल 198 किग्रा वजन उठाया। स्नैच में उन्होंने 83 किग्रा से शुरुआत की और दूसरे प्रयास में 85 किग्रा उठाया। इसके बाद तीसरे प्रयास में 87 किग्रा का सफल लिफ्ट किया।
क्लीन एंड जर्क में उन्होंने 107 किग्रा से शुरुआत की और दूसरे प्रयास में 111 किग्रा वजन उठाया। इसके बाद तीसरे प्रयास की जरूरत नहीं पड़ी। 87 किग्रा स्नैच और 111 किग्रा क्लीन एंड जर्क के कुल 198 किग्रा के स्कोर के साथ उन्होंने रजत पदक अपने नाम किया।
पैसे नहीं थे तो ट्रक ड्राइवरों से लेती थीं मदद
मीराबाई के संघर्ष की कहानी उनके शुरुआती प्रशिक्षण से भी जुड़ी है। स्रोत के मुताबिक, उनके गांव से इंफाल में स्थित खेल अकादमी करीब 25 किलोमीटर दूर थी और उनके पास रोजाना वहां आने-जाने के पर्याप्त पैसे नहीं थे।
ऐसे में वह नदी की रेत इंफाल तक ले जाने वाले ट्रक ड्राइवरों से मदद मांगती थीं। उनकी मदद से वह प्रशिक्षण के लिए अकादमी तक पहुंच पाती थीं।
विदेश जाती हैं तो साथ ले जाती हैं गांव का चावल
मीराबाई चानू को अपने गांव की मिट्टी और चावल से खास लगाव है। स्रोत के मुताबिक, विदेशी दौरों पर जाते समय वह अपने साथ मिट्टी और चावल लेकर जाती हैं और विदेश में भी गांव का चावल खाना पसंद करती हैं।
एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने तक मीराबाई चानू का सफर संघर्ष, मेहनत और खेल के प्रति समर्पण की कहानी है। तीरंदाज बनने के सपने से शुरू हुआ उनका सफर भारोत्तोलन तक पहुंचा और अब एशियन गेम्स में पहला पदक उनके करियर की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि बन गया है।





