कारोबार पर युद्ध की मार: टॉय पिस्टल के उत्पादन की लागत बढ़ी, कीमतों में उछाल के आसार

इस्राइल-ईरान युद्ध का असर अब बच्चों के पसंदीदा खिलौनों के कारोबार पर भी पड़ने लगा है। अलीगढ़ में बनने वाली टॉय पिस्टलों के निर्माण की लागत बढ़ गई है। पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी से प्लास्टिक का कच्चा माल महंगा हो गया है। हालांकि, पहले से मिले ऑर्डर के कारण फिलहाल खिलौना बंदूकों की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की गई है।
अलीगढ़ में प्लास्टिक की खिलौना बंदूकें बनाने वाले छोटे-बड़े करीब 35 कारखाने हैं। यहां रोजाना 60 हजार से अधिक बंदूकों का उत्पादन होता है। इनकी आपूर्ति देश के अलग-अलग राज्यों में की जाती है। इसके अलावा, कारोबारियों के माध्यम से बांग्लादेश और श्रीलंका तक भी इन खिलौनों का निर्यात होता है।
प्लास्टिक के दाने की कीमत में बड़ा उछाल
युद्ध के कारण अप्रैल के बाद से पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर प्लास्टिक की खिलौना बंदूकें बनाने वाले कारखानों पर पड़ा है। कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक, प्लास्टिक का दाना 100 रुपये से बढ़कर 160 रुपये प्रति किलो हो गया है। वहीं, एबीएस दाने की कीमत 140 रुपये से बढ़कर 220 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
कच्चे माल की कीमत बढ़ने से उत्पादन लागत में इजाफा हुआ है। इसके बावजूद निर्माताओं ने फिलहाल तैयार उत्पादों की कीमतें नहीं बढ़ाई हैं, क्योंकि दशहरा और दिवाली के लिए ऑर्डर पहले ही लिए जा चुके थे।
तीन रुपये से लेकर 800 रुपये तक की खिलौना बंदूकें
अलीगढ़ के कारखानों में तीन रुपये से लेकर 800 रुपये तक की खिलौना बंदूकें तैयार की जाती हैं। प्लास्टिक से बनी छोटी बंदूकों की कीमत तीन रुपये से शुरू होकर 25 से 30 रुपये तक होती है। वहीं, जस्ते और लोहे से बनी डिजाइनर पिस्टल और रिवॉल्वर 400 से 800 रुपये तक में तैयार की जाती हैं।
इनमें से कुछ डिजाइनर खिलौने देखने में असली पिस्टल और रिवॉल्वर जैसे दिखाई देते हैं। बच्चों की पसंद और बाजार की मांग को देखते हुए निर्माता हर साल इनके डिजाइन में बदलाव करते हैं।
देशभर में होती है सप्लाई
अलीगढ़ में खिलौना बंदूक बनाने के कारखाने देहलीगेट, सासनीगेट, पला साहिबाबाद रोड, महेंद्र नगर और पुराने शहर के इलाकों में संचालित हैं। यहां तैयार होने वाले खिलौनों की आपूर्ति राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल समेत कई राज्यों में की जाती है।
कारोबार का सालाना चक्र अप्रैल से शुरू होता है। इस दौरान कारोबारी देशभर में घूमकर ऑर्डर लेते हैं। जून तक ऑर्डर मिलने के बाद जुलाई से माल की आपूर्ति शुरू हो जाती है। दशहरा तक दुकानदारों के पास खिलौना बंदूकें पहुंचा दी जाती हैं, जिनकी बिक्री दिवाली और उसके बाद तक जारी रहती है।
कनस्तर की टिन से शुरू हुआ था कारोबार
अलीगढ़ में खिलौना बंदूक बनाने का काम करीब 50 साल पहले शुरू हुआ था। शुरुआत में खाली कनस्तरों की टिन को सपाट करके बंदूकें बनाई जाती थीं। बाद में लोहे की पतली चादरों से खिलौने तैयार किए जाने लगे और फिर प्लास्टिक से इनका निर्माण शुरू हुआ।
इस बीच चीन से भी प्लास्टिक की खिलौना बंदूकें आने लगीं। उनकी डिजाइन से प्रेरणा लेकर स्थानीय उद्यमियों ने अपने उत्पादों में सुधार किया। इसके बाद अलीगढ़ में प्लास्टिक और मेटल की अलग-अलग डिजाइन वाली खिलौना बंदूकें बनने लगीं।
निर्माताओं ने बताई कारोबार की स्थिति
बंदूक निर्माता मनोज भिलवारा के मुताबिक, इस्राइल-ईरान युद्ध के कारण प्लास्टिक का दाना महंगा हो गया है, जिससे खिलौना बंदूकों की निर्माण लागत बढ़ी है। हालांकि, अप्रैल, मई और जून में ही ऑर्डर मिल जाने के कारण फिलहाल उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की गई है।
वहीं, निर्माता सुनील पाली का कहना है कि बच्चों के बीच छोटी खिलौना बंदूकों की मांग सबसे ज्यादा रहती है। इसी वजह से इनका उत्पादन अधिक मात्रा में किया जाता है। बाजार में मांग बनाए रखने के लिए इनके डिजाइन हर साल बदले जाते हैं, जिसके लिए नई डाई भी तैयार करनी पड़ती है।





