आठवीं बार एशिया कप पर कब्जा, फिर भी क्यों परेशान है टीम इंडिया? मध्यक्रम और फील्डिंग बनी चिंता

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को 72 रन से हराकर आठवीं बार एशिया कप का खिताब अपने नाम किया। पूरे टूर्नामेंट में टीम इंडिया अजेय रही और बल्लेबाजी तथा गेंदबाजी में उसका दबदबा देखने को मिला। इसके बावजूद खिताब जीतने के बाद टीम के कुछ कमजोर पहलू चिंता बढ़ा रहे हैं। खासतौर पर मध्यक्रम की बल्लेबाजी और फील्डिंग में हुई गलतियां आने वाले बड़े मुकाबलों से पहले सुधार की मांग कर रही हैं।
भारत को अब एशियाई खेलों में भी हिस्सा लेना है। वहां एशिया कप में खेलने वाली कई टीमें ही सामने होंगी। ऐसे में टूर्नामेंट में सामने आई कमियों को नजरअंदाज करना टीम के लिए भारी पड़ सकता है।
शेफाली वर्मा का बदला अंदाज बना सबसे बड़ी सकारात्मक बात
भारत के लिए एशिया कप की सबसे बड़ी सकारात्मक बात शेफाली वर्मा का प्रदर्शन रहा। उन्होंने पूरे टूर्नामेंट में 236 रन बनाए। यह किसी सीरीज या टूर्नामेंट में उनके करियर का दूसरा सबसे बड़ा स्कोर है।
शेफाली ने ये रन 171.01 के शानदार स्ट्राइक रेट से बनाए। टूर्नामेंट में कम से कम 20 रन बनाने वाली बल्लेबाजों में उनका स्ट्राइक रेट सबसे बेहतर रहा।
इस बार शेफाली के खेल में सिर्फ आक्रामकता ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों के मुताबिक पारी को संभालने की क्षमता भी दिखाई दी। उन्होंने तीन अर्धशतक लगाए, जिसमें सेमीफाइनल और फाइनल के अर्धशतक भी शामिल हैं।
वह भले ही अपना पहला टी20 अंतरराष्ट्रीय शतक नहीं लगा सकीं, लेकिन लगातार आक्रामक बल्लेबाजी करने वाली शेफाली का यह बदला हुआ अंदाज भारत के लिए बड़ी राहत है। कप्तान हरमनप्रीत कौर ने भी फाइनल के बाद उनकी जिम्मेदारी भरी बल्लेबाजी की तारीफ की।
शेफाली ने गेंद से भी योगदान दिया। इससे भारतीय टीम के पास शीर्ष क्रम में एक ऐसा विकल्प मौजूद है, जो जरूरत पड़ने पर गेंदबाजी भी कर सकता है।
नंदनी और प्रेमा रावत ने बढ़ाया भरोसा
नंदनी शर्मा और प्रेमा रावत ने अपने पहले पूरे टूर्नामेंट में प्रभावशाली प्रदर्शन किया। दोनों खिलाड़ियों ने भारत को भविष्य के लिए दो अहम विकल्प दिए हैं।
नंदनी ने पावरप्ले में क्रांति गौड़ के साथ मिलकर विपक्षी टीमों पर दबाव बनाया। उन्होंने सात विकेट लिए। तेज गेंदबाजों में यह टूर्नामेंट का तीसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। पाकिस्तान की फातिमा सना ने नौ और बांग्लादेश की मरुफा अख्तर ने आठ विकेट लिए।
नंदनी की सबसे बड़ी खासियत उनकी किफायती गेंदबाजी रही। उनका इकॉनमी रेट 4.64 रहा। इसके अलावा फील्डिंग में भी उन्होंने प्रभावित किया और फाइनल में दो शानदार डाइविंग कैच पकड़े।
वहीं प्रेमा रावत ने अपनी लेग स्पिन से बल्लेबाजों को परेशान किया। उन्होंने भी सात विकेट लिए और पाकिस्तान के खिलाफ तीन विकेट लेकर विपक्षी पारी को बड़ा झटका दिया।
हालांकि भारतीय गेंदबाजी आक्रमण की असली परीक्षा अभी बाकी है। पूरे टूर्नामेंट में टीम ने लगभग एक ही गेंदबाजी संयोजन के साथ खेला। ऐसे में रेणुका सिंह, अरुंधति रेड्डी और राधा यादव जैसी अनुभवी खिलाड़ियों को ज्यादा मौके नहीं मिले।
मध्यक्रम ने बार-बार किया निराश
भारत की सबसे बड़ी कमजोरी मध्यक्रम की बल्लेबाजी रही। कई मुकाबलों में शीर्ष क्रम के मजबूत प्रदर्शन के बाद मध्यक्रम अपेक्षित तेजी से रन नहीं बना सका।
थाईलैंड के खिलाफ भारत का स्कोर एक समय एक विकेट पर 91 रन था, लेकिन इसके बाद टीम 137 रन पर नौ विकेट तक पहुंच गई। यानी 46 रन के भीतर आठ विकेट गिर गए।
हॉन्गकॉन्ग के खिलाफ स्मृति मंधाना ने 193.75 के स्ट्राइक रेट से 124 रन की शानदार पारी खेली, लेकिन नंबर तीन से सात तक के बल्लेबाजों ने मिलकर 39 गेंदों में सिर्फ 34 रन बनाए।
फाइनल में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली। भारत 13वें ओवर में बिना विकेट 129 रन बना चुका था। इसके बाद 19वें ओवर तक स्कोर पांच विकेट पर 167 रन हो गया। यानी महज 38 रन के अंदर पांच विकेट गिर गए।
पूरे टूर्नामेंट में भारत के नंबर तीन से सात तक के बल्लेबाजों का औसत सिर्फ 15.25 रहा। जेमिमा रोड्रिग्स की हैमस्ट्रिंग चोट के कारण गैरमौजूदगी ने भी इस कमजोरी को और बढ़ाया।
उनकी जगह टीम में शामिल की गईं प्रतिका रावल ने चार मैचों में 56 रन बनाए और उनका स्ट्राइक रेट 98.24 रहा। फाइनल में जी कमलिनी को मौका मिला, जिन्होंने सातवें नंबर पर पांच गेंदों में 15 रन बनाए।
बीच के ओवरों में रन गति भी चिंता का विषय
स्पिन के लिए मददगार परिस्थितियों में भारत का मध्यक्रम बीच के ओवरों में तेजी से रन बनाने में संघर्ष करता दिखा।
सातवें से 11वें ओवर के बीच भारतीय टीम का स्ट्राइक रेट 129.41 रहा, लेकिन 12वें से 16वें ओवर के बीच यह घटकर 120 हो गया।
इसके विपरीत श्रीलंका, बांग्लादेश और यहां तक कि थाईलैंड ने इन ओवरों में अपनी रन गति में सुधार किया। इससे साफ है कि भारत को बीच के ओवरों में दबाव बनाए रखने और तेजी से रन बनाने की रणनीति पर काम करना होगा।
अनुभवी कप्तान हरमनप्रीत कौर भी पूरे टूर्नामेंट में 91.02 के स्ट्राइक रेट से ही रन बना सकीं। सेमीफाइनल में उन्होंने 28 गेंदों पर नाबाद 24 रन बनाए।
भारती फुलमली की भूमिका पर भी सवाल
मध्यक्रम में फिनिशर की भूमिका के लिए टीम में शामिल की गईं भारती फुलमली को एशिया कप में सिर्फ दो बार बल्लेबाजी का मौका मिला।
सेमीफाइनल में 19वें ओवर और फाइनल में 17वें ओवर में विकेट गिरने के बावजूद उन्हें बल्लेबाजी के लिए नहीं भेजा गया। दोनों मौकों पर दीप्ति शर्मा को उनसे पहले बल्लेबाजी के लिए भेजा गया।
ऐसे में टीम प्रबंधन को यह तय करना होगा कि मुश्किल परिस्थितियों में मध्यक्रम को किस तरह मजबूत किया जाए और फिनिशर की भूमिका का बेहतर इस्तेमाल कैसे हो।
फील्डिंग में 14 कैच छोड़ना बड़ी चिंता
खिताब जीतने के बावजूद भारतीय टीम की फील्डिंग भी सवालों के घेरे में रही। पूरे टूर्नामेंट में भारत ने कुल 14 कैच छोड़े। दूसरे नंबर पर थाईलैंड रहा, जिसने छह कैच छोड़े।
फाइनल में ही भारतीय खिलाड़ियों ने पांच कैच टपकाए। इनमें से सभी मौके आसान नहीं थे, लेकिन बड़े मुकाबलों में इतने कैच छोड़ना मैच का रुख बदल सकता है।
मुख्य कोच अमोल मजूमदार ने खिताब जीतने के बाद हल्के-फुल्के अंदाज में भी माना कि कोचिंग स्टाफ के पास अब काम करने के लिए कुछ चीजें हैं।
खिताब के साथ कमियों पर भी नजर जरूरी
भारत ने पूरे टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन किया और बिना कोई मैच गंवाए आठवीं बार एशिया कप जीत लिया। शेफाली वर्मा, नंदनी शर्मा और प्रेमा रावत जैसी खिलाड़ियों का प्रदर्शन टीम के लिए सकारात्मक संकेत है।
लेकिन मध्यक्रम की अस्थिरता, बीच के ओवरों में धीमी रन गति और फील्डिंग में 14 कैच छोड़ने जैसी कमियां बड़े टूर्नामेंट में भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं।
आने वाले एशियाई खेलों और अन्य बड़े मुकाबलों से पहले टीम प्रबंधन के सामने इन कमजोरियों को दूर करने की चुनौती होगी। खिताब जीतने के बाद अब भारत की कोशिश यही होगी कि जीत की लय बरकरार रखते हुए इन कमियों पर भी काम किया जाए।





