अब चीन की सेना में रोबोट सैनिक? इंसानों जैसे रोबोट से युद्ध की तैयारी, जानें क्या है ड्रैगन का प्लान

चीन ह्यूमनॉइड रोबोट की तकनीक को तेजी से विकसित कर रहा है और अब इसके संभावित सैन्य इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। हालिया घटनाक्रम और चीनी सेना के आधिकारिक प्रकाशनों से संकेत मिले हैं कि बीजिंग रोबोटिक्स की आधुनिक तकनीक को सैन्य प्रशिक्षण और भविष्य के युद्ध में इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इस साल फरवरी में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो को चीन का बताते हुए दावा किया गया कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) इंसानों जैसे दिखने वाले ह्यूमनॉइड रोबोट को असॉल्ट राइफल चलाने की ट्रेनिंग दे रही है। हालांकि, उस समय वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं हुई थी। कुछ एआई चैटबॉट्स ने इसे एआई से तैयार वीडियो भी बताया था। चीन की ओर से भी इस वीडियो या रोबोट के सैन्य इस्तेमाल को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी।

पीएलए के अखबार में रोबोटिक लड़ाकों की बात

मामला तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया जब चीन में आयोजित वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स के बाद पीएलए के आधिकारिक अखबार में रोबोटिक्स को सैन्य प्रशिक्षण से जोड़कर टिप्पणी प्रकाशित की गई। इन खेलों में ह्यूमनॉइड रोबोट ने दौड़, कूद, बॉक्सिंग, डांस और स्केटिंग जैसी गतिविधियों में अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया था।

पीएलए के अखबार में शोधकर्ताओं से अपील की गई कि रोबोट बनाने में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक तकनीक को प्रयोगशालाओं से जल्द सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों तक पहुंचाया जाए, ताकि भविष्य में ‘रोबोटिक लड़ाके’ तैयार किए जा सकें। यही टिप्पणी चीन की रोबोटिक्स तकनीक के संभावित सैन्य इस्तेमाल की दिशा में एक अहम संकेत मानी जा रही है।

रोबोटिक्स में चीन कितना आगे?

चीन पहले से ही औद्योगिक रोबोट के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में शामिल है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स के अनुसार, 2024 में दुनिया भर में स्थापित किए गए औद्योगिक रोबोटों में चीन की हिस्सेदारी आधे से अधिक थी। चीन में ह्यूमनॉइड रोबोट बनाने वाली कंपनियां अपेक्षाकृत कम कीमत पर भी रोबोट उपलब्ध करा रही हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की कंपनी यूनिट्री का जी1 ह्यूमनॉइड रोबोट करीब 16 हजार डॉलर में उपलब्ध है। यह कीमत पश्चिमी देशों में विकसित किए जा रहे कई ह्यूमनॉइड रोबोटों की तुलना में काफी कम बताई गई है। कम लागत पर बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता चीन को इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।

इंसानी मूवमेंट का डेटा जुटाने की तैयारी

ह्यूमनॉइड रोबोट को बेहतर बनाने के लिए केवल हार्डवेयर ही नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में इंसानी गतिविधियों के डेटा की भी जरूरत होती है। इसी दिशा में चीन की ई-कॉमर्स कंपनी JD.com ने एक बड़े स्तर पर शारीरिक गतिविधियों का डेटा जुटाने की योजना शुरू की है।

रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी अपने एक लाख कर्मचारियों और पांच लाख अन्य लोगों को उनकी शारीरिक गतिविधियों को ट्रैक करने की अनुमति देने के लिए भुगतान कर रही है। लक्ष्य अगले दो वर्षों में करीब एक करोड़ घंटे का वास्तविक इंसानी मूवमेंट डेटा जुटाना है, जिसका इस्तेमाल रोबोट के एआई मॉडल को बेहतर बनाने में किया जा सकेगा।

सेना में पहले से रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल

चीन की सेना में रोबोटिक्स का इस्तेमाल पूरी तरह भविष्य की बात नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, पीएलए शहरी युद्ध अभ्यासों में मशीनगन से लैस चार पैरों वाले रोबोटिक कुत्तों, ड्रोन के बड़े झुंड और मानवरहित जमीनी वाहनों का इस्तेमाल कर रही है।

इन तकनीकों का इस्तेमाल तंग गलियों, बेसमेंट और इमारतों की छतों जैसे मुश्किल इलाकों में निगरानी और संभावित हमले के लिए किया जा रहा है। चीन की सेना एआई आधारित रोबोटिक सिस्टम और अन्य स्वायत्त तकनीकों का भी परीक्षण कर रही है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन की विवादित हिमालयी सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास शुरुआती ऑटोमेटेड रोबोटिक सिस्टम की पेट्रोलिंग से जुड़ी खबरें सामने आई हैं। चीन-वियतनाम सीमा पर भी ह्यूमनॉइड रोबोट के जरिए रसद, सीमा प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण जैसे कार्यों के पायलट प्रोजेक्ट चलाए जाने की जानकारी दी गई है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन ने रोबोटिक्स को अपनी तकनीकी और आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा बना लिया है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के फेलो रायन फेदासियुक का कहना है कि रोबोटिक्स तकनीक और उत्पादन के क्षेत्र में चीन तेजी से बढ़त बना रहा है।

वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा ह्यूमनॉइड रोबोट अभी सीमित और विशिष्ट कार्यों में ही बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं। वे तेज दौड़ने या बॉक्सिंग जैसी गतिविधियां कर सकते हैं, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में इंसानों की तरह जटिल और पूरी तरह स्वायत्त कार्य करने की क्षमता अभी विकसित नहीं हुई है। यूनिट्री के संस्थापक ने भी माना है कि रोबोटिक्स का वह दौर आने में अभी करीब एक दशक लग सकता है, जब रोबोट घरों और कार्यस्थलों पर पूरी तरह स्वायत्त तरीके से व्यापक काम कर सकें।

हालांकि, शंघाई की रोबोटिक्स कंपनी एजी बॉट के इंजीनियर यांग कुन ने यह स्वीकार किया है कि उनकी कंपनी का लक्ष्य सैन्य संघर्षों में इस्तेमाल के लिए रोबोट तकनीक को विकसित करना है।

क्या रोबोट सैनिकों की जगह ले सकते हैं?

ऑस्ट्रेलियाई सेना के पूर्व ब्रिगेडियर इयान लैंगफोर्ड के मुताबिक, चीन अपनी घटती जन्मदर और संभावित मैनपावर की कमी को देखते हुए रोबोटिक्स को भविष्य में इंसानी सैनिकों के विकल्प के रूप में देख सकता है। उनके अनुसार, अगर युद्ध के मैदान में इंसानों की जगह रोबोट भेजे जाने लगे तो सैनिकों की जान बचाने से जुड़ी चिंताएं कम हो सकती हैं, लेकिन इससे युद्ध के स्वरूप और नैतिकता से जुड़े नए सवाल भी खड़े होंगे।

लैंगफोर्ड ने यह भी चेतावनी दी कि युद्ध में रोबोट के इस्तेमाल से परिस्थितियां तेजी से नियंत्रण से बाहर होने का खतरा बढ़ सकता है। खासकर तब, जब स्वायत्त हथियारों के इस्तेमाल से परमाणु हथियारों से जुड़े रणनीतिक समीकरण प्रभावित हों।

दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के डॉ. मैल्कम डेविस का मानना है कि सेना में ह्यूमनॉइड रोबोटों का शुरुआती इस्तेमाल परिवहन, रसद और आपूर्ति जैसे कठिन या दोहराव वाले कार्यों में हो सकता है। इससे मानव सैनिकों को सीधे युद्धक भूमिकाओं के लिए बचाया जा सकेगा। साथ ही, उन्होंने स्वायत्त घातक रोबोटों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों की कमी पर भी चिंता जताई है।

निष्कर्ष

चीन की रोबोटिक्स क्षमता और पीएलए की ओर से इस तकनीक को सैन्य प्रशिक्षण से जोड़ने की अपील ने भविष्य के युद्ध को लेकर बहस तेज कर दी है। हालांकि, मौजूदा ह्यूमनॉइड रोबोट अभी इंसानी सैनिकों का पूरी तरह विकल्प बनने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन चीन जिस तेजी से रोबोटिक्स, एआई, ड्रोन और मानवरहित सैन्य प्रणालियों पर काम कर रहा है, उससे आने वाले वर्षों में युद्ध के मैदान में मानव-मशीन सहयोग की भूमिका बढ़ने की संभावना जरूर दिखाई देती है।

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