बाढ़ से मची भारी तबाही, लेकिन खबरें गायब! नेपाल-तिब्बत संकट पर चीन की कथित सेंसरशिप से उठे सवाल

नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन में सूचना की उपलब्धता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि स्थानीय लोगों की ओर से बनाए गए बाढ़ के कुछ वीडियो चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दिए गए। वहीं, प्रभावित इलाकों की स्वतंत्र जानकारी जुटाने पहुंचे विदेशी पत्रकारों को भी कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ा।
इस बीच नेपाल और तिब्बत में बाढ़ से हुई तबाही का आंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, दोनों क्षेत्रों में अब तक 675 लोगों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता हैं।
चीन पर क्या आरोप लगे?
रिपोर्टों के मुताबिक, बाढ़ से जुड़े कुछ वीडियो चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दिए गए। इनमें तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में एक सीमा चौकी के मलबे और पानी में बहने का दृश्य दिखाने वाला वीडियो भी शामिल बताया जा रहा है।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह वीडियो चीनी सोशल मीडिया से हटाया गया। वहीं, द टेलीग्राफ ने दावा किया कि चीन के सरकारी मीडिया ने अपनी रिपोर्ट में वीडियो के बजाय उसकी केवल एक तस्वीर का इस्तेमाल किया।
सरकारी मीडिया में राहत-बचाव पर जोर
चीन के सरकारी मीडिया की रिपोर्टों में बाढ़ से हुए नुकसान की विस्तृत तस्वीर के बजाय राहत और बचाव अभियान पर ज्यादा जोर दिया गया है। प्रभावित क्षेत्रों में सैन्यकर्मियों और आपातकालीन कर्मचारियों को तैनात करने की जानकारी दी गई है।
बचाव अभियान में ड्रोन और हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल की भी जानकारी सामने आई है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी ग्यिरोंग में बाढ़ प्रभावित लोगों की मदद के लिए हर संभव प्रयास करने का निर्देश दिया है।
विदेशी पत्रकारों के सामने क्या मुश्किलें?
तिब्बत में बाढ़ से हुए नुकसान की स्वतंत्र जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहे विदेशी पत्रकारों को भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्हें तिब्बत की यात्रा करने और वहां के स्थानीय लोगों से फोन पर बातचीत करने को लेकर पाबंदियों का सामना करना पड़ा।
इन प्रतिबंधों के कारण नेपाल के बाहर बाढ़ से हुए नुकसान का स्वतंत्र आकलन करना मुश्किल हो रहा है। तिब्बत को चीन के सबसे अधिक नियंत्रित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है।
‘तिब्बत से जुड़ी हर चीज राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी’
लंदन स्थित स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज के चीन संस्थान के निदेशक स्टीव त्सांग ने द गार्जियन से बातचीत में तिब्बत में सूचना नियंत्रण को लेकर अपनी बात रखी।
उनके मुताबिक, किसी रिपोर्ट को प्रकाशित करने से पहले उच्च स्तर से मंजूरी की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि तिब्बत से जुड़ी हर चीज को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखा जाता है और ऐसी जानकारी प्रकाशित नहीं की जाती जिसे उच्च स्तर से मंजूरी न मिली हो।
नेपाल के पूर्व सांसद ने भी उठाए सवाल
नेपाल की संसद के पूर्व सदस्य राजेंद्र बजगाईं ने भी चीन में पारदर्शिता की कमी को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर बाढ़ से जुड़े वीडियो हटाए जा रहे हैं तो इससे यह सवाल उठता है कि आखिर क्या छिपाने की कोशिश की जा रही है।
उनके मुताबिक, किसी आपदा से जुड़े सबूत हटाने से सच्चाई सामने लाने में मदद नहीं मिलती, बल्कि लोगों के सवाल उठाने का रास्ता भी बाधित होता है।
नेपाल-तिब्बत बाढ़ में 675 मौतें
नेपाल की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, नेपाल और तिब्बत में बाढ़ से मरने वालों की संयुक्त संख्या 675 हो गई है। वहीं 2498 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
चीनी अधिकारियों के अनुसार, तिब्बत में सात लोगों की मौत हुई है और 540 से ज्यादा लोग लापता हैं।
लापता लोगों में 261 विदेशी नागरिक
चीन के सरकारी प्रसारक सीसीटीवी के मुताबिक, तिब्बत में बाढ़ के बाद लापता 546 लोगों में 23 देशों के 261 विदेशी नागरिक शामिल हैं। चीनी अधिकारियों ने इस संबंध में संबंधित देशों के दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों को जानकारी दी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, लापता लोगों में 15 ब्रिटिश नागरिक भी शामिल हैं। हालांकि, नेपाल की ओर से पहले बताए गए 33 लापता ब्रिटिश नागरिकों के आंकड़े से इसका सीधा मिलान स्पष्ट नहीं है। कुछ लोगों के सीमा पार कर तिब्बत पहुंचने की आशंका भी जताई गई है।
नेपाल-तिब्बत बाढ़ के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रभावित क्षेत्रों में वास्तविक नुकसान कितना हुआ और वहां की पूरी जानकारी दुनिया के सामने कब तक आ पाएगी। चीन की ओर से राहत और बचाव अभियान की जानकारी दी जा रही है, लेकिन सूचना की स्वतंत्र उपलब्धता को लेकर उठ रहे सवालों ने इस आपदा को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।





