स्कूलों को पोर्टल पर रखना होगा वाहनों की फिटनेस का डेटा, 15 अप्रैल तक देना होगा ब्योरा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अब 1972 के पुराने कानून के तहत किरायेदार ‘जरूरत’ के नाम पर मुकदमेबाजी नहीं कर सकेंगे।
कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम-2021 लागू होने के बाद स्थिति बदल गई है। अब यदि मकान मालिक अपनी संपत्ति वापस चाहता है, तो उसकी जरूरत ही अंतिम मानी जाएगी और इस पर अदालत में बहस की गुंजाइश सीमित होगी।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने कानपुर निवासी श्याम पाल की याचिका खारिज करते हुए की।
मामला कानपुर के गांधी नगर की एक दुकान से जुड़ा है, जहां मकान मालिक ने अपने व्यवसाय के विस्तार के लिए दुकान खाली करने की मांग की थी। किरायेदार ने इसे चुनौती दी, लेकिन किराया प्राधिकरण और अपीलीय न्यायाधिकरण दोनों ने बेदखली के आदेश को सही ठहराया।
हाईकोर्ट ने भी इन फैसलों पर मुहर लगाते हुए कहा कि अब यह तर्क नहीं चलेगा कि मकान मालिक के पास अन्य संपत्तियां हैं या उसकी जरूरत उतनी जरूरी नहीं है।
हालांकि, अदालत ने मानवीय आधार पर किरायेदार को दुकान खाली करने के लिए निर्धारित समय तक की मोहलत दी है और इस दौरान उपयोग शुल्क देने का निर्देश भी दिया है।





