वसुंधरा ताल पर अब खतरे की मिलेगी पहले सूचना, सीबीआरआई ने तैयार किया अर्ली वार्निंग सिस्टम

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से होने वाली संभावित आपदाओं के खतरे को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य की वसुंधरा ताल में पहली बार अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की ने इस प्रणाली को विकसित किया है। इसका उद्देश्य हिमनद झीलों की निगरानी मजबूत करना और संभावित बाढ़ के खतरे की समय रहते जानकारी उपलब्ध कराना है।
ग्लेशियल झीलों से बाढ़ का खतरा कम करने की पहल
ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों में पानी का स्तर बढ़ने या झील का बांध टूटने से अचानक बाढ़ आ सकती है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ऐसी घटनाओं से पहाड़ी क्षेत्रों में जान-माल और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
वसुंधरा ताल में स्थापित अर्ली वार्निंग सिस्टम का उद्देश्य झील की निगरानी करना और संभावित खतरे के बारे में समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था को मजबूत करना है।
सीबीआरआई और वाडिया संस्थान के विशेषज्ञ शामिल
उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) की ओर से राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत यह अभियान चलाया जा रहा है। अभियान में सीबीआरआई, रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं।
आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, वसुंधरा ताल उत्तराखंड की पहली हिमनद झील है, जहां यह पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है।
दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में चल रहा अभियान
उच्च हिमालयी क्षेत्र की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए अभियान दल के साथ राज्य आपदा प्रतिवादन बल (एसडीआरएफ), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ) और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान भी तैनात हैं। ये दल वैज्ञानिकों को सुरक्षा, आवागमन और अन्य जरूरी सहायता उपलब्ध करा रहे हैं।
अभियान के लिए यूएसडीएमए ने आवश्यक समन्वय और लॉजिस्टिक सहायता भी उपलब्ध कराई है। मोबाइल नेटवर्क की अनुपलब्धता को देखते हुए टीम को सैटेलाइट फोन और लो अर्थ ऑर्बिट डिवाइस दिए गए हैं, ताकि वैज्ञानिकों का प्राधिकरण से संपर्क बना रहे।
15 अक्टूबर तक प्रस्तावित है अभियान
वसुंधरा ताल में निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए चलाया जा रहा अभियान 15 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है। यह पहल उत्तराखंड की हिमनद झीलों से जुड़े जोखिमों की निगरानी और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम है।





